कटघोरा एसडीएम कार्यालय में वर्ष 2014 के चार अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों के मूल आधार अभिलेख नहीं मिलने का मामला; जनसूचना अधिकारी समेत अन्य जिम्मेदारों पर एफआईआर की मांग
छत्तीसगढ़/कोरबा :- सरकारी दफ्तरों में महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या अनुसूचित जनजाति के स्थायी जाति प्रमाण पत्र जैसे संवेदनशील दस्तावेजों के आधार अभिलेख बरसात के पानी में भीगकर नष्ट हो सकते हैं? यदि ऐसा हुआ, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है और अभिलेखों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था थी? ये सवाल कटघोरा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय में वर्ष 2014 के जाति प्रमाण पत्रों से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के मामले में उठ रहे हैं। छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश संयोजक अधिवक्ता दिलीप मिरी ने इस मामले में जिला कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी, कोरबा से शिकायत कर उच्चस्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है।
आरटीआई में मांगे चार प्रमाण पत्रों के आधार दस्तावेज
शिकायत के अनुसार, सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत कटघोरा एसडीएम कार्यालय से वर्ष 2014 में जारी अनुसूचित जनजाति के चार स्थायी जाति प्रमाण पत्रों के आधार दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। इनमें रघुनाथ बानरा, नंदुलाल, ईश्वर एक्का और रंजीत लकड़ा के नाम शामिल हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों के जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए थे। आवेदक का कहना है कि जनसूचना अधिकारी ने जवाब में बताया कि बरसात के पानी में भीगने के कारण दस्तावेज कट-फटकर नष्ट हो गए हैं। शिकायतकर्ता ने इस जवाब को गंभीर और संदेहास्पद बताते हुए अभिलेखों की सुरक्षा तथा उनके नष्ट होने की परिस्थितियों की जांच की मांग की है।
सूचना आयोग के समक्ष भी दिया गया यही जवाब
अधिवक्ता दिलीप मिरी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के समक्ष भी संबंधित कार्यालय की ओर से इसी प्रकार का जवाब प्रस्तुत किया गया। उनका कहना है कि इसके चलते मांगी गई जानकारी अब तक प्राप्त नहीं हो सकी है। शिकायत में सवाल उठाया गया है कि वर्ष 2014 के महत्वपूर्ण शासकीय अभिलेख यदि वास्तव में नष्ट हुए हैं, तो उनके नष्ट होने की तारीख, परिस्थितियों, जिम्मेदारी और नियमानुसार की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां है? क्या अभिलेखों को नष्ट करने से पहले निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया था? इन बिंदुओं की जांच से ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
23 जाति प्रमाण पत्रों के निलंबन का भी उल्लेख
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि ऐसे कुल 23 जाति प्रमाण पत्रों को जिला स्तरीय जाति सत्यापन समिति, कोरबा द्वारा निलंबित किया गया है। शिकायतकर्ता ने इस संदर्भ को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की है। हालांकि, संबंधित चार प्रमाण पत्रों के आधार दस्तावेजों के नष्ट होने और कथित फर्जीवाड़े के बीच कोई सीधा संबंध है या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल शिकायत में उठाए गए आरोपों और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
रिकॉर्ड नष्ट होने पर जिम्मेदारी तय करने की मांग
अधिवक्ता मिरी ने कलेक्टर से एसडीएम कार्यालय कटघोरा के रिकॉर्ड रूम की उच्चस्तरीय प्रशासनिक जांच कराने की मांग की है। साथ ही, तत्कालीन और वर्तमान रिकॉर्ड कीपर, संबंधित जनसूचना अधिकारी तथा अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई करने का आग्रह किया है। शिकायत में भारतीय न्याय संहिता और लोक अभिलेख अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए एफआईआर दर्ज कराने की मांग भी की गई है।
अब जांच से ही खुलेगा अभिलेखों के नष्ट होने का राज
सरकारी रिकॉर्ड का सुरक्षित रखरखाव प्रशासनिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि महत्वपूर्ण अभिलेख वास्तव में नष्ट हुए हैं, तो यह पता लगाना आवश्यक है कि ऐसा किन परिस्थितियों में हुआ, क्या इसके लिए कोई जिम्मेदार है और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया गया था। दूसरी ओर, केवल दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने या उनके नष्ट होने की सूचना के आधार पर किसी प्रमाण पत्र को फर्जी अथवा किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। ऐसे में कलेक्टर स्तर पर निष्पक्ष जांच, रिकॉर्ड रूम के दस्तावेजों का परीक्षण और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविकता स्पष्ट हो पाएगी।












