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सीएसईबी की जमीनों पर अवैध कब्जों का जाल, क्या अधिकारियों की मौन स्वीकृति से फल-फूल रहा खेल?

कागजों में कटे कनेक्शन, लेकिन क्वार्टरों में जल रही बिजली — बड़ा घोटाला?

छत्तीसगढ़/कोरबा :-  शहर में छत्तीसगढ़ स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CSEB) की कीमती सरकारी जमीनों पर लगातार बढ़ते अवैध कब्जों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात यह हैं कि वर्षों से खाली पड़ी सीएसईबी की भूमि और कॉलोनियां अब धीरे-धीरे अवैध बस्तियों में तब्दील होती जा रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह सब बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं है। जिस तरह खुलेआम कब्जे हो रहे हैं, उससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि कहीं न कहीं संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत या मौन सहमति इस पूरे मामले में शामिल है।

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प्रधानमंत्री आवास योजना पर भी उठे सवाल

सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि इन विवादित जमीनों पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकानों की स्वीकृति तक मिल रही है। सवाल यह उठता है कि आखिर सरकारी जमीन पर किसी भी योजना के तहत निर्माण की अनुमति कैसे दी जा सकती है? क्या संबंधित विभागों ने जमीन के स्वामित्व की जांच नहीं की, या फिर सिस्टम में कहीं गंभीर चूक—या जानबूझकर की गई अनदेखी—है?

BRS के बाद शुरू हुआ कब्जों का सिलसिला

करीब 10 वर्ष पूर्व सीएसईबी में बड़ी संख्या में कर्मचारियों द्वारा BRS (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) लेने के बाद बड़ी संख्या में क्वार्टर खाली हुए थे। आरोप है कि उसी समय कुछ अधिकारियों ने निजी लाभ के लिए इन क्वार्टरों को अवैध रूप से बेच दिया या लोगों को कब्जा करने की छूट दे दी। यही वह दौर था, जब से सीएसईबी की संपत्तियों पर अवैध कब्जों का सिलसिला तेज हो गया। लेकिन यह सिलसिला इसके पूर्व भी चल रहा था ।

मकानों के साथ दुकानों का भी अवैध कारोबार

चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि इन अवैध कब्जों तक ही मामला सीमित नहीं है, बल्कि कब्जाई गई जमीनों पर लोगों ने न केवल मकान बना लिए हैं, बल्कि दुकानों का निर्माण कर व्यवसाय भी शुरू कर दिया है। इससे यह अवैध कब्जे अब स्थायी आर्थिक गतिविधि में बदलते जा रहे हैं, जिससे भविष्य में इन्हें हटाना और भी जटिल होता जा रहा है।

रिटायरमेंट के बाद भी क्वार्टरों पर कब्जा, ‘सेटिंग’ का खेल जारी

सूत्रों के अनुसार, कुछ अधिकारी और कर्मचारी रिटायर होने के बाद भी विभागीय अधिकारियों से कथित ‘सेटिंग’ कर किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर क्वार्टर अलॉट करवा रहे हैं और स्वयं ही उन पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह व्यवस्था न केवल नियमों की खुली अनदेखी है, बल्कि विभागीय प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

बुधवारी सहित कई कॉलोनियों का बदला स्वरूप

आज स्थिति यह है कि बुधवारी क्षेत्र सहित कई जगहों पर कभी व्यवस्थित और सुंदर मानी जाने वाली सीएसईबी कॉलोनियों की पहचान तक मिट चुकी है।

जहां पहले सुव्यवस्थित क्वार्टर और हरियाली हुआ करती थी, वहां अब अनियोजित निर्माण और अवैध इमारतें खड़ी हो गई हैं। कई स्थानों पर मूल कॉलोनी को तोड़कर नए भवन बना दिए गए हैं, तो कहीं खाली जमीनों पर कब्जा कर स्थायी निर्माण कर लिया गया है।

कागजों में कटे कनेक्शन, लेकिन क्वार्टरों में जल रही बिजली — बड़ा घोटाला?

एक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें कई ऐसे क्वार्टर चिन्हित किए जा रहे हैं जिनके विद्युत कनेक्शन कागजों में काट दिए गए हैं। इसके बावजूद उन क्वार्टरों में बिजली का उपयोग जारी है और लाइटें जल रही हैं। बताया जा रहा है कि इन क्वार्टरों में रहने वाले लोग अवैध रूप से बिजली कनेक्शन लेकर उपयोग कर रहे हैं, जिससे शासन को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस पूरे मामले में सीएसईबी के विद्युत विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

इतना ही नहीं, मीटर रीडिंग करने वाले कर्मचारियों की संलिप्तता भी संदेह के घेरे में है। वहीं विभागीय विद्युत जांच करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर कागजों में कनेक्शन कटने के बाद भी इन क्वार्टरों में बिजली आपूर्ति कैसे बहाल है।

वोट बैंक की राजनीति बनी बाधा

अब जब इन क्षेत्रों में पूरी बस्तियां बस चुकी हैं, तो कार्रवाई करना प्रशासन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जानकारों का मानना है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते भी सख्त कदम उठाने में हिचकिचाहट हो रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब शुरुआत में ही सख्ती दिखाई जाती, तो क्या आज यह स्थिति बनती?

जांच और जवाबदेही की मांग

यह मामला अब केवल अवैध कब्जों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें प्रशासनिक लापरवाही, संभावित भ्रष्टाचार और सिस्टम की कमजोरी जैसे गंभीर पहलू भी जुड़े हुए हैं। आवश्यक है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो और यह तय किया जाए कि आखिर किन परिस्थितियों में सरकारी संपत्तियां इस तरह अतिक्रमण और अनियमितताओं की भेंट चढ़ती गईं। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इस गंभीर मुद्दे पर कब तक चुप्पी साधे रहते हैं और क्या वाकई इस पूरे मामले में जवाबदेही तय की जाती है या नहीं।

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