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कांग्रेस ने गरीब की मासूम बेटी की कीमत 50 लाख रुपये आंकी? राष्ट्रपति से फांसी, मुआवजा और सरकारी नौकरी की मांग

रजगामार हत्याकांड पर जिला कांग्रेस कमेटी कोरबा ग्रामीण ने राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन, 90 दिनों में फैसला कराने की मांग; सवाल—क्या एक अबोध बच्ची की जिंदगी की कीमत किसी रकम से तय हो सकती है?

छत्तीसगढ़/कोरबा:-  रजगामार में सात वर्षीय मासूम बच्ची की निर्मम हत्या ने पूरे जिले को झकझोर दिया है। इस जघन्य घटना के बाद जिला कांग्रेस कमेटी कोरबा ग्रामीण ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर आरोपी को फांसी की सजा दिलाने, मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने और 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाने की मांग की है। इसके साथ ही कांग्रेस ने पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये मुआवजा देने तथा परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी प्रदान करने की मांग भी उठाई है। हालांकि, इस मांग के बीच एक सवाल चर्चा में है—क्या एक गरीब परिवार की अबोध बेटी की जिंदगी की कीमत 50 लाख रुपये है? क्या किसी रकम से उस अपूरणीय क्षति की भरपाई हो सकती है, जिसने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी?

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राष्ट्रपति से कठोर सजा और पीड़ित परिवार के लिए सहायता की मांग

जिला कांग्रेस कमेटी कोरबा ग्रामीण के अध्यक्ष मनोज चौहान के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन में कांग्रेस ने इस जघन्य अपराध के लिए दोषी को कठोरतम सजा दिलाने की मांग की है। ज्ञापन में मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने और 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाने की मांग रखी गई है। कांग्रेस ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी प्रदान की जाए, ताकि इस कठिन समय में परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके।

क्या 50 लाख रुपये की सहायता पर्याप्त है?

बच्ची का परिवार मेहनत-मजदूरी कर जीवनयापन करता है। बेटी को खोने का दुख ऐसा है, जिसकी भरपाई दुनिया की कोई रकम नहीं कर सकती। ऐसे में कांग्रेस की ओर से 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग के साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या पीड़ित परिवार की परिस्थितियों और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए यह सहायता पर्याप्त होगी? मुआवजे की मांग करना परिवार को सहारा देने का एक प्रयास हो सकता है, लेकिन किसी मासूम की जिंदगी को किसी रकम के बराबर आंकना संभव नहीं है।

इसलिए बहस केवल 50 लाख रुपये की राशि पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी होनी चाहिए कि परिवार को न्याय के साथ लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक सहारा कैसे मिले। बच्ची के पिता मेहनत-मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। ऐसी परिस्थिति में बेटी को खोने के बाद परिवार के सामने भावनात्मक पीड़ा के साथ भविष्य की चिंता भी खड़ी है।

गरीब की बेटी के न्याय में आर्थिक हैसियत बाधा न बने

इस घटना ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया है—क्या गरीब और संपन्न परिवारों को न्याय तथा सहायता के मामले में समान संवेदनशीलता मिलती है? किसी परिवार की आर्थिक स्थिति उसके न्याय पाने के अधिकार को कम नहीं कर सकती। गरीब की बेटी की जिंदगी भी उतनी ही अनमोल है, जितनी किसी संपन्न परिवार की बेटी की। ऐसे मामलों में प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी है कि जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुसार तेजी से आगे बढ़े और पीड़ित परिवार को नियमानुसार सहायता मिले।

कांग्रेस ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देकर अपनी मांगें रख दी हैं। अब देखना होगा कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और उसके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। एक मासूम की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती, लेकिन निष्पक्ष और त्वरित न्याय तथा उचित सहायता से उसके परिवार को संबल जरूर दिया जा सकता है। आखिरकार, न्याय की कसौटी मुआवजे की राशि भर नहीं, बल्कि यह भी है कि पीड़ित परिवार को न्याय, सम्मान और सुरक्षित भविष्य के लिए वास्तविक सहारा मिले।

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