देशभर से पढ़ने पहुंचे विद्यार्थियों के सामने आवास का संकट; सीमित हॉस्टल सीटों के बीच निजी PG संचालकों पर मनमाने किराये और अव्यवस्थाओं से छात्र परेशान
छत्तीसगढ़/बिलासपुर :- छत्तीसगढ़ के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (GGU) में इस वर्ष देश के कोने-कोने से आए छात्रों ने बड़े अरमानों के साथ दाखिला लिया है। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों (UG, PG, B.Tech, Ph.D) में लगभग 3,500 से 4,000 से अधिक नए छात्रों ने प्रवेश लिया है। लेकिन शिक्षा के इस गढ़ में कदम रखते ही बाहरी छात्रों के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है—सिर छिपाने के लिए छत यानी हॉस्टल का न मिलना।
6 हॉस्टल, 1,672 सीटें और हजारों नए छात्र
विश्वविद्यालय के आधिकारिक डेटाबेस के आधार पर यदि वास्तविक स्थिति को देखें तो कैंपस के अंदर कुल छह हॉस्टल संचालित हैं। इनमें तीन लड़कों और तीन लड़कियों के लिए हैं। इन सभी हॉस्टलों की कुल क्षमता करीब 1,672 सीटों की बताई जाती है।
नियम के मुताबिक इन सीटों में द्वितीय, तृतीय और अंतिम वर्ष के वरिष्ठ छात्र पहले से रह रहे होते हैं। ऐसे में नए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या काफी सीमित रह जाती है। इस वर्ष प्रवेश लेने वाले नए छात्रों के हिस्से में बमुश्किल 400 से 500 सीटें ही आ पाने की स्थिति बनती है।
यानी बड़ी संख्या में नए और विशेषकर बाहरी विद्यार्थी हॉस्टल सुविधा से वंचित होकर कैंपस के बाहर रहने को मजबूर हैं।
नियम में बाहरी छात्रों को प्राथमिकता, फिर भी क्यों भटक रहे विद्यार्थी?
विश्वविद्यालय के हॉस्टल नियमों में स्पष्ट रूप से मेरिट में ऊंचे स्थान वाले तथा बिलासपुर से बाहर के रहने वाले छात्रों को प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान बताया जाता है। इसके बावजूद बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड सहित अन्य राज्यों और छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी अंचलों से आए छात्रों को भी रहने के लिए जगह तलाशनी पड़ रही है।
विश्वविद्यालय के एडमिशन ब्रोशर में यह डिस्क्लेमर जरूर दिया जाता है कि विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने का मतलब हॉस्टल आवंटन की गारंटी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जब बड़ी संख्या में विद्यार्थी बाहर से पढ़ने आ रहे हैं, तब उनके सुरक्षित और सम्मानजनक आवास की व्यवस्था को लेकर संस्थागत जिम्मेदारी कितनी है?
हॉस्टल नहीं मिला तो निजी PG का सहारा
कैंपस में हॉस्टल नहीं मिलने के बाद कोनी और आसपास के इलाकों में संचालित निजी PG और लॉज विद्यार्थियों के लिए मजबूरी का विकल्प बन गए हैं। आरोप है कि छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाकर कुछ PG संचालक मनमाना किराया और अतिरिक्त रकम वसूल रहे हैं, लेकिन इसके बदले पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।
छोटे कमरों में 3 से 4 छात्रों की भीड़
विद्यार्थियों की शिकायत है कि अधिक कमाई के लिए कुछ स्थानों पर छोटे-छोटे कमरों में तीन से चार छात्रों को एक साथ रखा जा रहा है। सीमित जगह में अधिक विद्यार्थियों के रहने से उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
गर्मी और उमस में वेंटिलेशन तक नहीं
बिलासपुर की भीषण गर्मी और उमस के बावजूद कई PG में पर्याप्त हवा की निकासी की व्यवस्था नहीं होने की शिकायतें हैं। कुछ कमरों में एग्जॉस्ट फैन तक नहीं लगाए गए हैं। विद्यार्थियों के अनुसार रात के समय कमरों में उमस और गर्मी के कारण सोना तक मुश्किल हो जाता है।
सफाई व्यवस्था पर भी सवाल
कई PG में नियमित साफ-सफाई नहीं होने की शिकायत भी सामने आ रही है। विद्यार्थियों का कहना है कि कुछ जगहों पर लंबे समय तक सफाई नहीं कराई जाती। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण के कारण विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
सुरक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक—जवाबदेही किसकी?
देश के अलग-अलग राज्यों और छत्तीसगढ़ के दूरस्थ जिलों से अभिभावक अपने बच्चों को GGU में पढ़ने के लिए भेजते हैं। उनके लिए यह विश्वास महत्वपूर्ण है कि बच्चे सुरक्षित वातावरण में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।
ऐसे में कैंपस से बाहर रहने वाले हजारों विद्यार्थियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? यदि किसी छात्र के साथ कोई अप्रिय घटना हो जाती है या स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या उत्पन्न होती है, तो इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
निजी PG पर निगरानी कौन करेगा?
यह भी सवाल उठ रहा है कि कोनी और आसपास संचालित निजी PG की सुरक्षा, स्वच्छता, भवन की स्थिति, विद्यार्थियों की संख्या और मूलभूत सुविधाओं की नियमित जांच कौन करता है। क्या जिला प्रशासन, नगर निगम और विश्वविद्यालय प्रबंधन के स्तर पर इसके लिए कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था है?
नए हॉस्टल निर्माण की बढ़ती जरूरत
GGU को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिले लंबा समय बीत चुका है और हर वर्ष यहां देशभर से विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में विश्वविद्यालय की बढ़ती छात्र संख्या के अनुरूप हॉस्टल क्षमता का विस्तार समय की जरूरत बन चुका है।
यदि नए हॉस्टलों का निर्माण नहीं कराया गया और विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक आवास व्यवस्था को लेकर ठोस नीति नहीं बनाई गई तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
पड़ताल में उठे सवाल
क्या विश्वविद्यालय प्रशासन हॉस्टल की वास्तविक उपलब्धता और नए प्रवेशित विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात को सार्वजनिक करेगा?
क्या हॉस्टल नियमों में बाहरी और मेरिट वाले विद्यार्थियों को दी जाने वाली प्राथमिकता का पूरी तरह पालन हो रहा है?
कैंपस के बाहर रहने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं की निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या निजी PG संचालकों द्वारा विद्यार्थियों से लिए जा रहे किराये और उपलब्ध सुविधाओं की कोई जांच होती है?
और सबसे बड़ा सवाल—देश के अलग-अलग हिस्सों से GGU में पढ़ने पहुंचे विद्यार्थियों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराने के लिए नए हॉस्टलों का निर्माण कब होगा?
शिक्षा का केंद्र बने GGU में विद्यार्थियों का भविष्य केवल कक्षा और किताबों तक सीमित नहीं है। उनके लिए सुरक्षित आवास, स्वच्छ वातावरण और मूलभूत सुविधाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। अब देखना यह है कि विश्वविद्यालय और प्रशासन इन सवालों पर क्या कदम उठाता है।












