छत्तीसगढ़/कोरबा। शहर के सौंदर्यीकरण पर लाखों रुपए खर्च कर सड़कों, चौराहों और प्रमुख मार्गों को आकर्षक बनाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अवैध रूप से लगाए जा रहे बैनर, पोस्टर और फ्लेक्स इन प्रयासों पर पानी फेरते नजर आ रहे हैं। पावर हाउस रोड, टीपी नगर, सीएसईबी, बुधवारी और निहारिका मार्ग जैसे व्यस्त इलाकों में जगह-जगह लगे बैनर-फ्लेक्स शहर की सुंदरता को बिगाड़ रहे हैं। 
सड़क के बीच डिवाइडर, किनारों, लैम्प पोस्ट, पेड़-पौधों, रेलवे और बिजली के खंभों तक पर बेतरतीब तरीके से लगाए गए पोस्टर न केवल दृश्य प्रदूषण फैला रहे हैं, बल्कि वाहन चालकों का ध्यान भटकाकर हादसों का खतरा भी बढ़ा रहे हैं। खास मौकों, आयोजनों और बधाई संदेशों के नाम पर इन्हें लगवाने की होड़ तो दिखती है, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इन्हें हटाने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। 
रेलवे संपत्तियों पर भी अवैध कब्जा
स्थिति चिंताजनक तब और हो जाती है जब रेलवे की संपत्तियां भी इससे अछूती नहीं हैं। रेलवे की दीवारों, पुलों, समपार फाटकों और परिसरों में भी अवैध रूप से बैनर-पोस्टर और होर्डिंग लगाए जा रहे हैं, जो न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सुरक्षा मानकों के लिए भी खतरा बन सकता है। हाल ही में धीरेंद्र शास्त्री के दिव्य दरबार का चार दिवसीय आयोजन कटघोरा के ढपढप क्षेत्र में किया गया था। इस आयोजन के प्रचार-प्रसार के लिए 28 मार्च से पहले पूरे शहर और जिले में बड़े पैमाने पर बैनर-पोस्टर लगाए गए थे। हैरानी की बात यह है कि शहर के भीतर रेलवे के समपार फाटकों सहित कई स्थानों पर लगाए गए ये पोस्टर आज तक नहीं हटाए गए हैं, जिससे अव्यवस्था और साफ नजर आ रही है। 
स्थिति यह है कि कई बैनर-पोस्टर 15 दिनों से लेकर महीनों तक लगे रहते हैं। मौसम की मार और कमजोर बंधान के कारण ये फटकर बदहाल हो जाते हैं, फिर भी अपनी जगह पर टंगे रहते हैं। हाल के दिनों में आए आंधी-तूफान के बाद तो इनकी हालत और खराब हो गई है—कहीं फ्लेक्स फटकर लटक रहे हैं, तो कहीं टेढ़े-मेढ़े और उल्टे नजर आ रहे हैं। डिवाइडरों और खंभों पर एक के ऊपर एक पोस्टर चिपकाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन्हें ये बैनर-पोस्टर लगवाने की जिम्मेदारी होती है, वे आयोजन समाप्त होने के बाद इन्हें हटाने में उदासीनता क्यों दिखाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक बैनर पूरी तरह चिथड़ों में तब्दील न हो जाए, तब तक उन्हें हटाना जरूरी नहीं समझा जाता। इस लापरवाही का खामियाजा नगर निगम को भुगतना पड़ता है। कर्मचारियों और संसाधनों का उपयोग कर अंततः निगम को ही इन बैनर-पोस्टरों को हटाना पड़ता है, जिससे अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। 
नेताओं और आयोजनों के प्रति समर्थकों की भावना अपनी जगह सही है, लेकिन सम्मान के नाम पर लगाए गए बैनरों का फटेहाल होकर सार्वजनिक स्थानों पर लटकना कहीं न कहीं अपमानजनक भी बन जाता है। स्थिति तब और शर्मनाक हो जाती है जब इन पोस्टरों पर पान की पीक और गंदगी साफ नजर आती है।
ऐसे में जरूरत है कि बैनर-पोस्टर लगाने के लिए स्पष्ट नियम तय किए जाएं और उनकी समय-सीमा का सख्ती से पालन कराया जाए। साथ ही, आयोजन समाप्त होने के बाद इन्हें हटाने की जिम्मेदारी तय कर कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए, ताकि शहर का सौंदर्यीकरण वास्तविक रूप में नजर आ सके।











