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समाज कल्याण विभाग की लापरवाही: नियमों का हवाला देकर नहीं दी बैटरी चलित ट्राई साइकिल, सुशासन तिहार में 28 वर्षीय दिव्यांग बेटी को गोद में लेकर पहुंची लाचार मां—वहां भी मिला आश्वासन

कटघोरा क्षेत्र की कॉलेज मे पढ़ाई कर रही छात्रा एक साल से परेशान, अब सुशासन तिहार की तैयारियों पर भी उठे सवाल

छत्तीसगढ़/कोरबा :- यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां योजनाएं कागजों में सिमट जाती हैं और जरूरतमंद लोग राहत के बजाय केवल आश्वासन लेकर लौटने को मजबूर हो जाते हैं। कटघोरा क्षेत्र की एक 28 वर्षीय दिव्यांग छात्रा, जो पढ़-लिखकर अपने जीवन को बेहतर बनाने का सपना देख रही है, आज भी मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष कर रही है।

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1 मई दिन शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के जनपद पंचायत कटघोरा अंतर्गत धनरास ग्राम पंचायत में आयोजित सुशासन तिहार शिविर में यह मार्मिक दृश्य सामने आया, जब एक मां अपनी 28 वर्षीय दिव्यांग बेटी को गोद में लेकर पहुंची। यह दृश्य न केवल मौजूद लोगों को भावुक कर गया, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर गया। परिवार को उम्मीद थी कि यहां उनकी समस्या का समाधान होगा, लेकिन उन्हें फिर निराशा ही हाथ लगी।       

नियमों का हवाला, नहीं मिला लाभ

पीड़िता की मां के अनुसार, एक माह पूर्व समाज कल्याण विभाग, कोरबा में बैटरी चलित ट्राई साइकिल के लिए आवेदन किया गया था। विभागीय अधिकारियों ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि चार वर्ष पहले ट्राई साइकिल दी जा चुकी है और शासन के प्रावधान के अनुसार पांच वर्ष बाद ही पुनः पात्रता बनती है।

सुशासन तिहार में भी नहीं हुआ निराकरण

उम्मीद के साथ सुशासन तिहार शिविर पहुंची मां-बेटी को वहां भी राहत नहीं मिली। शिविर में बैटरी चलित ट्राई साइकिल उपलब्ध नहीं थी। अधिकारियों ने छुट्टी का हवाला देते हुए बाद में देने का आश्वासन देकर मामला टाल दिया।

सबसे बड़ा सवाल—शिविर में क्यों नहीं थी ट्राई साइकिल?

इस पूरे मामले में अब सबसे अहम सवाल यह खड़ा होता है कि जब सुशासन तिहार का उद्देश्य ही आम जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करना है, तो फिर समाज कल्याण विभाग द्वारा शिविर में बैटरी चलित ट्राई साइकिल जैसी आवश्यक सामग्री उपलब्ध क्यों नहीं कराई गई?

क्या विभाग को संभावित जरूरतमंदों का पूर्व आकलन नहीं था, या फिर यह आयोजन केवल औपचारिकता बनकर रह गया?

शिविर के बाद भटकती रही मां-बेटी

संवेदनहीनता की तस्वीर तब और गहरी हो गई, जब शिविर समाप्त होने के बाद मां-बेटी को यह पता चला कि जिस वाहन से वे आई थीं, वह जा चुका है। मां अपनी जवान बेटी को गोद में लेकर इधर-उधर भटकती रही—यह दृश्य व्यवस्था की असफलता को बयां करने के लिए काफी था। बाद में एक स्थानीय पत्रकार की मदद से उन्हें घर पहुंचाया गया।

पढ़ाई प्रभावित, सपनों पर बोझ

दिव्यांग छात्रा पहले बैटरी ट्राई साइकिल के सहारे कॉलेज जाती थी, लेकिन पिछले एक वर्ष से इस सुविधा से वंचित है। अब उसे बस और ऑटो के सहारे बड़ी मुश्किलों के साथ कॉलेज पहुंचना पड़ता है। आर्थिक तंगी के चलते परिवार स्वयं यह सुविधा उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है।

व्यवस्था पर उठे सवाल, जवाब का इंतजार

यह घटना न केवल समाज कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली, बल्कि सुशासन तिहार की तैयारियों और उसके उद्देश्य पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है। एक ओर सरकार दिव्यांगों और बेटियों के सशक्तिकरण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इस तरह की घटनाएं उन दावों की हकीकत उजागर करती हैं। वही यह क्षेत्र एनटीपीसी का गोद लिया गांव है क्या एनटीपीसी की ओर से इस तरह की व्यवस्था नहीं करनी थी । पूर्व में एनटीपीसी की ओर से दिव्यांगों को स्कूटी वितरण किया जाता था जो अब बंद कर दिया गया है ।

जरूरत संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई की

ऐसे मामलों में केवल नियमों का हवाला देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए त्वरित समाधान आवश्यक है। यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो यह सिर्फ एक बेटी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता मानी जाएगी।

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