“शिक्षा व्यवस्था कमजोर तो देश का भविष्य कमजोर!”
छत्तीसगढ़/कोरबा :- #@ जिस देश की शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, उस देश का भविष्य भी मजबूत नहीं हो सकता। आज के बच्चे ही कल के युवा हैं और यही युवा आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और सामाजिक विकास में अपनी भूमिका निभाएंगे। ऐसे में शिक्षा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण नींव है।
लेकिन विडंबना यह है कि तमाम सरकारी योजनाओं, करोड़ों रुपये के बजट और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के दावों के बावजूद देश में शिक्षा का स्तर आज भी कई सवालों के घेरे में है।
सरकारी स्कूलों में संसाधन बढ़े, लेकिन जवाबदेही कितनी?
सरकार सरकारी स्कूलों में भवन, स्मार्ट क्लास, शिक्षण सामग्री, छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन सहित अनेक योजनाओं पर बड़ी राशि खर्च कर रही है। इसके बावजूद कई स्थानों से शिक्षकों की समय पर स्कूल नहीं पहुंचने, नियमित कक्षाएं नहीं लगने और स्कूलों की व्यवस्थाओं में लापरवाही की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
शिक्षा का मंदिर तभी मजबूत होगा, जब वहां पढ़ाने वाले शिक्षक भी अपनी जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाएं। सरकारी स्कूल किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के पैसे से संचालित सार्वजनिक संस्थान हैं। इसलिए यहां जवाबदेही और निगरानी दोनों आवश्यक हैं।
निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था भी बड़ा सवाल
दूसरी ओर निजी स्कूलों की व्यवस्था को लेकर अभिभावकों की अपनी परेशानियां हैं। फीस, अलग-अलग शुल्क, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों का बोझ लगातार परिवारों पर बढ़ता जा रहा है।
कोरबा जिले में भी अभिभावकों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब स्कूलों में लंबे समय तक ग्रीष्मकालीन अवकाश रहता है, तब उस अवधि की फीस किस आधार पर ली जाती है?
यदि किसी निजी स्कूल में अप्रैल से मार्च तक 12 महीने की फीस निर्धारित है और जून जैसे अवकाश वाले महीने में भी मासिक फीस ली जाती है, तो अभिभावकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि यह फीस किस स्वीकृत फीस संरचना और किस नियम के तहत निर्धारित की गई है।
यहां सवाल केवल फीस देने या नहीं देने का नहीं है। सवाल फीस निर्धारण में पारदर्शिता, नियमों के पालन और अभिभावकों के अधिकारों का है।
शिक्षा विभाग की निगरानी पर भी उठने चाहिए सवाल
निजी स्कूलों के संचालन, फीस संरचना और अभिभावकों से संबंधित शिकायतों की निगरानी के लिए संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय है। ऐसे में यदि लगातार शिकायतें सामने आती हैं तो केवल शिकायत प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि शिक्षा विभाग स्कूलों की नियमित मॉनिटरिंग करे, फीस संरचना की जांच करे और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई सुनिश्चित करे।
अभिभावक भी केवल फीस जमा करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए आर्थिक और मानसिक रूप से निवेश कर रहे हैं। उन्हें स्कूल की फीस और अन्य शुल्कों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
शिक्षा केवल व्यवसाय नहीं, राष्ट्र निर्माण का माध्यम है
निजी स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कई निजी विद्यालय बेहतर शिक्षा और अनुशासन के माध्यम से बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सभी संस्थानों के लिए समान रूप से आवश्यक है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं होना चाहिए। बच्चों में ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक जिम्मेदारी और देश के प्रति कर्तव्यबोध विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
आज जिस तरह नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से धीरे-धीरे दूर होती दिखाई दे रही है, उसमें परिवार के साथ-साथ शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
केंद्र और राज्य सरकारों को बनानी होगी स्पष्ट व्यवस्था
देश में सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों के लिए नियम मौजूद हैं, लेकिन चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें:
- सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति और शिक्षण कार्य की नियमित निगरानी हो।
- निजी स्कूलों की फीस संरचना पूरी तरह पारदर्शी हो।
- अभिभावकों से लिए जाने वाले प्रत्येक शुल्क का स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराया जाए।
- फीस संबंधी शिकायतों के लिए सरल और प्रभावी शिकायत प्रणाली हो।
- नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर समयबद्ध कार्रवाई हो।
- शिक्षा विभाग की मॉनिटरिंग व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
- बच्चों की शिक्षा और अभिभावकों की आर्थिक क्षमता, दोनों का ध्यान रखा जाए।
कोरबा से उठता सवाल
कोरबा औद्योगिक जिले के रूप में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां बड़ी संख्या में कर्मचारी, श्रमिक और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों का सहारा लेते हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अभिभावकों को स्कूलों की फीस व्यवस्था के संबंध में पूरी पारदर्शिता मिल रही है? क्या अवकाश अवधि की फीस को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं? और यदि नियम हैं तो उनका पालन सुनिश्चित कराने के लिए शिक्षा विभाग की निगरानी कितनी प्रभावी है? इन सवालों का जवाब केवल अभिभावकों को नहीं, बल्कि संबंधित शिक्षा अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन को भी देना चाहिए।
देश का भविष्य कागजों पर बनने वाली योजनाओं से नहीं, बल्कि कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों से बनता है।
देश का भविष्य कागजों पर बनने वाली योजनाओं से नहीं, बल्कि कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों से बनता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में कहीं शिक्षक की लापरवाही है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि कहीं निजी स्कूल नियमों की अनदेखी कर रहे हैं तो वहां भी प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
शिक्षा को व्यवस्था, व्यवसाय और औपचारिकता के बीच उलझाने के बजाय उसे जवाबदेही, गुणवत्ता और संस्कार से जोड़ना होगा।
आज आवश्यकता किसी एक स्कूल या किसी एक विभाग पर सवाल उठाने की नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी और जवाबदेह शिक्षा व्यवस्था बनाने की है, जिसमें सरकारी स्कूलों में लापरवाही की जगह न हो और निजी स्कूलों में मनमानी की गुंजाइश न हो।
क्योंकि आज की कक्षा में बैठा बच्चा ही कल के भारत का निर्माता है। उसके भविष्य के साथ किसी भी स्तर पर समझौता, वास्तव में देश के भविष्य के साथ समझौता है।

















