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शिवाय हॉस्पिटल में वेंटिलेटर का भरोसा, फिर दर-दर भटकता रहा मरीज; एनकेएच में पैसों के अभाव में नहीं मिला इलाज, मौत के बाद कलेक्टर से शिकायत

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था वेंटिलेटर को लेकर हंगामे का वीडियो, परिजनों का आरोप—करीब 2-3 घंटे तक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकता रहा 29 वर्षीय अरुण

छत्तीसगढ़/कोरबा :-  ट्रांसपोर्ट नगर स्थित शिवाय हॉस्पिटल में वेंटिलेटर की उपलब्धता को लेकर हुए हंगामे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब इसी घटनाक्रम से जुड़ी एक दर्दनाक कहानी सामने आई है। 29 वर्षीय मरीज की मौत के बाद उसके परिजनों ने शिवाय हॉस्पिटल प्रबंधन और स्वप्निल झा पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। परिजनों ने जिला कलेक्टर को लिखित शिकायत देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि मरीज को लेकर परिजन एनकेएच हॉस्पिटल पहुंचे, लेकिन तत्काल पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण वहां मरीज को भर्ती नहीं कराया जा सका। इसके बाद मरीज को फिर शिवाय हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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मृतक की पहचान जांजगीर-चांपा जिले के कचंदा निवासी अरुण दास (29) के रूप में हुई है। शिकायतकर्ता मृतक के चाचा कैलाश दास के अनुसार अरुण को 14 सितंबर को जिला अस्पताल कोरबा में भर्ती कराया गया था। 15 सितंबर को इलाज के दौरान उसकी हालत अचानक बिगड़ गई और उसे सांस लेने में गंभीर परेशानी होने लगी। मरीज को वेंटिलेटर लगाया गया, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। परिजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल में समय पर सोनोग्राफी और सीटी स्कैन नहीं हो सका, जिसके बाद उन्होंने मरीज को निजी अस्पताल ले जाने का फैसला किया।

रात 11:40 बजे मिला वेंटिलेटर का भरोसा

परिजनों की शिकायत के अनुसार रात करीब 11:40 बजे उन्होंने ट्रांसपोर्ट नगर स्थित शिवाय हॉस्पिटल में संपर्क किया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि स्वप्निल झा से फोन पर बातचीत के दौरान मरीज की गंभीर स्थिति और वेंटिलेटर की जरूरत के बारे में बताया गया। इस पर अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध होने की जानकारी देते हुए मरीज को तत्काल लाने के लिए कहा गया।

इसके बाद परिजन वेंटिलेटर युक्त एम्बुलेंस की व्यवस्था कर रात करीब 12:30 से 1 बजे के बीच मरीज को लेकर शिवाय हॉस्पिटल पहुंचे। लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि उस समय कोई वेंटिलेटर खाली नहीं है।

उम्मीद लेकर पहुंचे एनकेएच, लेकिन पैसे नहीं जुटा सके

शिवाय हॉस्पिटल में वेंटिलेटर नहीं मिलने के बाद परिजन मरीज को लेकर पास स्थित जैन हॉस्पिटल पहुंचे। शिकायत के अनुसार वहां डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने के कारण उपचार नहीं मिल सका। इसके बाद वे मरीज को लेकर कोसाबाड़ी स्थित एनकेएच हॉस्पिटल पहुंचे। यहां परिजनों के सामने एक और मुश्किल खड़ी हो गई। शिकायत में कहा गया है कि तत्काल पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण मरीज को एनकेएच में भर्ती नहीं कराया जा सका।

गंभीर हालत में मरीज को लेकर परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहे। इसी बीच उन्होंने दोबारा शिवाय हॉस्पिटल से संपर्क किया। शिकायत के अनुसार इस बार उन्हें बताया गया कि वेंटिलेटर खाली हो गया है और मरीज को वापस लाया जा सकता है।

फिर शिवाय पहुंचे, लेकिन जिंदगी हार चुकी थी

परिजन एक बार फिर एम्बुलेंस से मरीज को लेकर शिवाय हॉस्पिटल पहुंचे। लेकिन तब तक काफी समय गुजर चुका था। अस्पताल में चिकित्सकों ने मरीज की जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।

परिजनों का आरोप है कि वेंटिलेटर उपलब्ध होने की जानकारी के आधार पर मरीज को शिवाय हॉस्पिटल ले जाया गया था। यदि शुरुआत में ही वेंटिलेटर की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर दी जाती, तो वे सीधे किसी अन्य अस्पताल में उपचार की कोशिश कर सकते थे। उनका दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में करीब 2 से 3 घंटे मरीज को एम्बुलेंस में लेकर इधर-उधर भटकना पड़ा।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था हंगामे का वीडियो

मामले के बीच शिवाय हॉस्पिटल में वेंटिलेटर को लेकर परिजनों के हंगामे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो में परिजन वेंटिलेटर की उपलब्धता को लेकर नाराजगी जाहिर करते नजर आ रहे थे। अब मरीज की मौत और उसके बाद कलेक्टर को दी गई शिकायत ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर बना दिया है।

बड़े दावों के बीच आपातकाल में मरीज के लिए कितनी संवेदनशील व्यवस्था?

यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी अस्पतालों की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और उनकी जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। निजी अस्पताल आधुनिक सुविधाओं, बेहतर इलाज और 24 घंटे आपातकालीन सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन जब कोई गंभीर मरीज जिंदगी और मौत के बीच अस्पताल की चौखट पर पहुंचता है, तब क्या उसे समय पर उपचार, वेंटिलेटर और आवश्यक चिकित्सा सुविधा मिलना सुनिश्चित है?

इस मामले में परिजनों की शिकायत के अनुसार एक अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध होने का भरोसा दिया गया, लेकिन पहुंचने पर सुविधा उपलब्ध नहीं मिली। दूसरे अस्पताल में तत्काल पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण मरीज को भर्ती नहीं कराया जा सका। इसके बाद मरीज को फिर पहले अस्पताल ले जाना पड़ा और अंततः उसकी मौत हो गई।

सवाल यह है कि गंभीर मरीज के लिए आपातकालीन स्थिति में अस्पतालों की जिम्मेदारी आखिर कहां तक है? क्या पैसे की तत्काल व्यवस्था न हो पाने की स्थिति में किसी गंभीर मरीज को उपचार से वंचित किया जाना चाहिए? क्या अस्पतालों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं और आपातकालीन सेवाओं की वास्तविक स्थिति की नियमित निगरानी होती है? और यदि किसी अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है, तो मरीज के परिजनों को पहले ही स्पष्ट जानकारी देने की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?

ये सवाल इस घटना के बाद उठ रहे हैं। इनका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस शिकायत पर क्या कार्रवाई करता है और संबंधित अस्पताल प्रबंधन इन आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देता है।

हालांकि, परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। शिवाय हॉस्पिटल प्रबंधन, स्वप्निल झा, जैन हॉस्पिटल अथवा एनकेएच हॉस्पिटल का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद मामले की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

पत्नी और छह माह के बच्चे को छोड़ गया अरुण

इस घटना का सबसे मार्मिक पहलू यह है कि 29 वर्षीय अरुण दास अपने पीछे पत्नी और महज छह माह के मासूम बच्चे को छोड़ गया। परिवार के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक उम्मीद लेकर दौड़ने के बाद मिली मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मृतक के चाचा कैलाश दास सहित परिजनों ने कलेक्टर से पूरे मामले की निष्पक्ष प्रशासनिक एवं चिकित्सकीय जांच कराने की मांग की है। शिकायत में शिवाय हॉस्पिटल प्रबंधन और स्वप्निल झा पर लगाए गए आरोपों की जांच कर जिम्मेदारी तय करने तथा दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की गई है।

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