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मानव तस्करी रोकने पुलिस खुद पहुंचे घटनास्थल, ऑनलाइन नेटवर्क पर भी रखे नजर

नवा रायपुर में राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित, 139 अधिकारियों ने लिया प्रशिक्षण; पीड़ितों के सुरक्षित पुनर्वास और तस्करी के पूरे नेटवर्क की जांच पर जोर

छत्तीसगढ़/रायपुर :-  मानव तस्करी के मामलों में प्रभावी कार्रवाई, पीड़ितों की सुरक्षा और अपराध में शामिल पूरे नेटवर्क तक पहुंचने के उद्देश्य से पुलिस मुख्यालय, नवा रायपुर में एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई। पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में पुलिस, श्रम, महिला एवं बाल विकास, अभियोजन तथा शिक्षा विभाग के कुल 139 अधिकारियों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने मानव तस्करी के बदलते तौर-तरीकों, ऑनलाइन भर्ती, डिजिटल माध्यमों से होने वाले शोषण, त्वरित बचाव और पीड़ितों के पुनर्वास के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी दी।   

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थाना स्तर तक पहुंचे प्रशिक्षण का लाभ : डीजीपी

कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर उप पुलिस महानिरीक्षक, सीआईडी रामकृष्ण साहू ने अतिथियों का प्रतीक चिह्न एवं पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया। पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम ने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य केवल वरिष्ठ अधिकारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका लाभ थाना स्तर तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी के मामलों में कार्रवाई केवल पुलिस विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें अन्य विभागों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उन्होंने मानव तस्करी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके तहत लोगों को बंधुआ मजदूरी कराने, लैंगिक शोषण, भीख मंगवाने और घरेलू कार्यों में शोषणपूर्ण परिस्थितियों में नियोजित करने जैसे अपराध किए जाते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रभावी जांच और समन्वित कार्रवाई आवश्यक है।

अपराध की सूचना का इंतजार न करे पुलिस, पूरे नेटवर्क की हो जांच

कार्यशाला के प्रथम सत्र में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एवं एनडीआरएफ के पूर्व महानिदेशक डॉ. पी.एम. नायर ने मानव तस्करी की रोकथाम और जांच के विभिन्न पहलुओं पर प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस को केवल अपराध की सूचना मिलने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर संभावित अपराध स्थलों तक पहुंचकर कार्रवाई करनी चाहिए। कई बार अपराध की जानकारी पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाती।

उन्होंने तस्करी के मामलों में स्रोत, पारगमन और गंतव्य क्षेत्रों को जोड़कर जांच करने पर जोर दिया। साथ ही भर्ती करने वाले, परिवहन करने वाले, निगरानी रखने वाले, खरीदने-बेचने में शामिल व्यक्तियों, वित्तपोषकों और साजिशकर्ताओं सहित पूरे नेटवर्क से जुड़े लोगों के विरुद्ध साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जांच केवल पीड़ित को बचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि अपराध के पूरे तंत्र को उजागर करना भी जरूरी है।

अब ऑनलाइन संदेशों से शुरू हो सकती है मानव तस्करी

दूसरे सत्र में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय सचिव ओमप्रकाश पाल तथा सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता एवं संगठन की प्रमुख विधि सलाहकार रचना त्यागी ने ऑनलाइन भर्ती और शोषण से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

विशेषज्ञों ने बताया कि मानव तस्करी की शुरुआत अब केवल पारंपरिक बिचौलियों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप, गेमिंग प्लेटफॉर्म और जॉब पोर्टल पर भेजे जाने वाले संदेशों से भी हो सकती है। इस प्रक्रिया में पहले पीड़ित का विश्वास जीता जाता है, फिर उस पर नियंत्रण स्थापित कर आवागमन, शोषण और आर्थिक लाभ कमाने का सिलसिला शुरू होता है। अपराधी डिजिटल पहचान बदलकर दोबारा नए लोगों को निशाना बना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि जांच के दौरान केवल यह पता लगाना पर्याप्त नहीं है कि बच्चे को कौन ले गया। यह भी पता लगाना जरूरी है कि उसकी भर्ती किसने की, उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक किसने पहुंचाया, उस पर नियंत्रण किसका था, शोषण से किसने लाभ कमाया और नेटवर्क में आगे कौन लोग सक्रिय हैं। इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी और तकनीकी साक्ष्यों का प्रभावी इस्तेमाल जरूरी है।

रेस्क्यू के बाद चिकित्सा, आश्रय और पुनर्वास भी जरूरी

तृतीय सत्र में विषय विशेषज्ञ विपिन ठाकुर ने मानव तस्करी के संभावित पीड़ितों की समय पर पहचान और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पीड़ितों को बचाने के बाद उनकी चिकित्सा सहायता, सुरक्षित आश्रय, मनोसामाजिक सहयोग, कानूनी सहायता और दीर्घकालिक पुनर्वास सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं पूर्व केंद्रीय सचिव बी. भामती सुब्रमणियम ने पीड़ितों की सुरक्षा, उत्तरजीवियों के सशक्तीकरण और डिजिटल युग में मानव तस्करी के मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने पर अपने विचार रखे। उन्होंने पीड़ितों की परिस्थितियों को समझते हुए उनकी गरिमा, सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखकर कार्रवाई किए जाने के महत्व को रेखांकित किया।

पुनर्वास योजनाओं की दी गई जानकारी

कार्यशाला में महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर संचालक अर्चना राणा सेठ तथा श्रम विभाग के सहायक श्रमायुक्त ने मानव तस्करी के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए राज्य में लागू योजनाओं की जानकारी दी। विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय, पीड़ितों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराने और उन्हें सामान्य जीवन में लौटने के लिए सहयोग देने पर भी चर्चा हुई।

कार्यशाला में पुलिस विभाग की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट के नोडल अधिकारियों एवं अन्य अधिकारियों सहित संबंधित विभागों के कुल 139 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। कार्यक्रम के अंत में सहायक पुलिस महानिरीक्षक रवि कुमार कुर्रे ने कार्यशाला की अनुशंसाएं प्रस्तुत कीं तथा अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

कार्यशाला के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि मानव तस्करी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए केवल अपराध होने के बाद कदम उठाना पर्याप्त नहीं है। संभावित पीड़ितों की समय पर पहचान, डिजिटल माध्यमों से होने वाली गतिविधियों पर नजर, पूरे आपराधिक नेटवर्क की जांच और पीड़ितों का सुरक्षित पुनर्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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