नई रिपोर्ट में खुलासा—1970 के दशक की तुलना में दोगुने से ज्यादा बढ़े खतरनाक उमस वाले दिन, भारत के तटीय और मैदानी इलाके सबसे अधिक प्रभावित
भारत में गर्मी का खतरा अब केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं रह गया है। हवा में बढ़ती नमी (उमस) भी लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। नई रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी और उमस का मिला-जुला असर शरीर को खतरनाक सीमा तक पहुंचा सकता है, जिससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
जब भी गर्मी बढ़ती है, लोगों की नजर थर्मामीटर पर टिक जाती है। 40, 42 या 45 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा चर्चा का विषय बनता है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि कई बार असली खतरा तापमान में नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी यानी उमस में छिपा होता है। यही वजह है कि 38 डिग्री तापमान के साथ अधिक उमस, 44 डिग्री की सूखी गर्मी से भी ज्यादा घातक साबित हो सकती है।
हाल ही में जारी Climate Central की रिपोर्ट ने इस खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1970 के दशक में दुनिया में औसतन 10 दिन ऐसे होते थे, जब गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंचता था। अब यह संख्या बढ़कर 23 दिन प्रति वर्ष हो गई है। यानी खतरनाक उमस वाले दिनों की संख्या दोगुने से भी अधिक हो चुकी है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में दर्ज 23 खतरनाक उमस भरे दिनों में से 19 दिन सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े पाए गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि 1970 के बाद से ऐसे लगभग 64 प्रतिशत खतरनाक दिनों के पीछे मानवजनित जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है।
भारत के लिए क्यों बढ़ रही चिंता
भारत उन देशों में शामिल है, जहां गर्मी और नमी का मेल करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, कोच्चि और विशाखापट्टनम जैसे तटीय शहरों के अलावा गंगा के मैदानी इलाकों में भी मानसून से पहले और बाद में उमस लोगों की परेशानी बढ़ा देती है। ऐसे मौसम में पसीना तो खूब निकलता है, लेकिन वह सूख नहीं पाता, जिससे शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहता है।
कैसे बनती है जानलेवा स्थिति
मानव शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा रखता है। लेकिन हवा में नमी अधिक होने पर पसीना वाष्पित नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप शरीर के भीतर गर्मी जमा होने लगती है। इससे हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय रोग और सांस संबंधी समस्याओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, पहले से बीमार लोग तथा खुले में काम करने वाले मजदूर सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
‘वेट बल्ब तापमान’ से मापा जाता है खतरा
वैज्ञानिक केवल सामान्य तापमान नहीं, बल्कि वेट बल्ब तापमान के आधार पर भी खतरे का आकलन करते हैं। इसमें हवा की नमी को भी शामिल किया जाता है। 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक वेट बल्ब तापमान को स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण माना जाता है।
961 शहरों के अध्ययन में बड़ा खुलासा
रिपोर्ट में दुनिया के 961 शहरों का विश्लेषण किया गया। इनमें 69 प्रतिशत शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण खतरनाक उमस वाले दिनों की संख्या बढ़ी है। पिछले एक दशक में इन शहरों में औसतन 46 अतिरिक्त खतरनाक दिन प्रति वर्ष दर्ज किए गए।
सावधानी ही बचाव
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक उमस के दौरान पर्याप्त पानी पीना, दोपहर की धूप से बचना, हल्के सूती कपड़े पहनना, जरूरत पड़ने पर ठंडे स्थान पर रहना और बच्चों व बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है। यदि चक्कर आना, अत्यधिक कमजोरी, तेज बुखार या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
गौरतलब है कि…
भारत में गर्मी की चर्चा अक्सर बढ़ते तापमान तक सीमित रहती है, लेकिन अब वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है कि आने वाले वर्षों में असली चुनौती केवल तापमान नहीं, बल्कि बढ़ती उमस होगी। जलवायु परिवर्तन के इस नए खतरे को समझना और उससे बचाव की तैयारी करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।











