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भीषण गर्मी के बीच छुट्टियों पर ‘एक्स्ट्रा क्लास’ का खेल! आदेश के बावजूद प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर उठे सवाल, फीस वसूली का नया तरीका?

छत्तीसगढ़/कोरबा :- राज्य में लगातार बढ़ती भीषण गर्मी और लू के प्रकोप को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा बड़ा फैसला लेते हुए सभी सरकारी, निजी एवं अनुदान प्राप्त स्कूलों में 20 अप्रैल 2026 से 15 जून 2026 तक ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया गया है। यह निर्णय बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया, जबकि पहले यह छुट्टी 1 मई से प्रस्तावित थी।

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लेकिन शासन के इस स्पष्ट आदेश के बावजूद कुछ निजी स्कूल संचालकों द्वारा नियमों को दरकिनार करने की तैयारी सामने आ रही है। जानकारी के अनुसार, 21 अप्रैल से ही कई प्राइवेट स्कूलों में “एक्स्ट्रा क्लास” के नाम पर बच्चों को बुलाने की योजना बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, बच्चों को सिविल ड्रेस में आने के निर्देश भी दिए जा रहे हैं, जिससे यह गतिविधि आधिकारिक रूप से छुट्टी के उल्लंघन के बावजूद छिपाई जा सके।

 गर्मी में बच्चों की सेहत से खिलवाड़?

इस भीषण गर्मी में जब तापमान लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में बच्चों को स्कूल बुलाना उनके स्वास्थ्य के साथ गंभीर जोखिम माना जा रहा है। अभिभावकों में भी इसको लेकर चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही है।

 फीस वसूली का नया तरीका ?

सूत्रों के मुताबिक, इन “एक्स्ट्रा क्लास” के पीछे एक और बड़ा कारण सामने आ रहा है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन अप्रैल और जून माह की फीस वसूलने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं, जबकि 21 अप्रैल से 15 जून तक शासन द्वारा स्पष्ट रूप से अवकाश घोषित किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन 55 दिनों की फीस वसूली कितनी उचित है?

सिलेबस बदलकर भी कमाई का आरोप

अभिभावकों का यह भी कहना है कि कई स्कूल हर साल एडमिशन के समय किताबों का सिलेबस बदल देते हैं, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। इसे भी एक तरह से अवैध कमाई का माध्यम बताया जा रहा है।

 क्या लगेगी मनमानी पर लगाम ?

इन घटनाओं के सामने आने के बाद अब यह मुद्दा तेजी से तूल पकड़ रहा है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने की मांग तेज हो रही है।

 नेपाल मॉडल की चर्चा तेज

देश में अब नेपाल की तर्ज पर निजी स्कूलों पर सख्त नियंत्रण या प्रतिबंध लगाने की मांग भी उठने लगी है। नेपाल में लागू व्यवस्था के तहत सरकारी, राजनेताओं और उद्योगपतियों के बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का नियम लागू किया गया है।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में भी ऐसी कोई सख्त व्यवस्था लागू होगी? क्या शिक्षा के इस मंदिर में पारदर्शिता और समानता लाई जा सकेगी? फिलहाल, अभिभावक शासन से कड़ी कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

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