सुशासन तिहार में शिकायत पर जनपद पंचायत से अटैच किए गए सचिव को फिर सौंप दी गई पंचायत की कमान, भ्रष्टाचार और मनमानी के आरोपियों पर कार्रवाई की बजाय नई पोस्टिंग
छत्तीसगढ़/कोरबा :- जिला पंचायत कोरबा में ग्राम पंचायत सचिवों की पदस्थापना को लेकर जारी दो आदेश अब गंभीर सवालों के घेरे में हैं। महज सात दिनों के भीतर जिला पंचायत सीईओ द्वारा अपने ही आदेश में संशोधन किए जाने से प्रशासनिक पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े होने लगे हैं। चर्चा यह भी है कि क्या यह पूरा खेल केवल प्रशासनिक आवश्यकता था या फिर इसके पीछे कोई दबाव अथवा आर्थिक लाभ का समीकरण काम कर रहा है?
8 जून 2026 को जारी आदेश में लक्ष्मीनारायण राजपूत को ग्राम पंचायत कनकी से अमलडीहा, गितेन्द्र जायसवाल को अमलडीहा से कनकी तथा सरगबुंदिया का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। वहीं सरगबुंदिया के सचिव प्रमोद कुमार राठिया को हटाकर जनपद पंचायत करतला में संबद्ध किया गया था।
लेकिन महज सात दिन बाद 15 जून को संशोधित आदेश जारी कर पूरी व्यवस्था बदल दी गई। नए आदेश में प्रमोद कुमार राठिया को सीधे ग्राम पंचायत कनकी का सचिव बना दिया गया, जबकि गितेन्द्र जायसवाल को सरगबुंदिया और लक्ष्मीनारायण राजपूत को अमलडीहा भेज दिया गया।
सुशासन तिहार की शिकायत का क्या हुआ?
सूत्रों के अनुसार, जिन सचिवों के खिलाफ भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, शराबखोरी और मनमानी जैसे आरोपों को लेकर शिकायतें हुई थीं, उन पर कार्रवाई की बजाय उन्हें नई पंचायतों की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस सचिव को शिकायतों के बाद जनपद पंचायत में संबद्ध किया गया था, उसी अधिकारी को एक सप्ताह बाद फिर पंचायत की कमान सौंप दी गई।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि शिकायतें गंभीर थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि शिकायतें निराधार थीं तो फिर उन्हें पहले हटाया ही क्यों गया?
आखिर सात दिन में ऐसा क्या हुआ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला पंचायत द्वारा जारी पहला आदेश क्या गलत था? यदि पहला आदेश सही था तो फिर सात दिन बाद उसमें बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि पहला आदेश गलत था तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग बन गई है कार्रवाई का विकल्प?
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि पंचायत विभाग में शिकायतों और आरोपों का परिणाम कार्रवाई नहीं बल्कि केवल तबादला बनकर रह गया है। नोटिस जारी करने की औपचारिकता निभाई जाती है और फिर संबंधित कर्मचारियों को दूसरी पंचायत में भेजकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
बड़ा सवाल : क्या आर्थिक लाभ के लिए खेला जा रहा है ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल?
जिला पंचायत में महज सात दिनों के भीतर आदेश बदलने से अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं—
● क्या जिला पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी ट्रांसफर-पोस्टिंग को आर्थिक लाभ का जरिया बना रहे हैं?
● क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति या दबाव के चलते पहले आदेश को बदलना पड़ा?
● जिन सचिवों पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप हैं, उन्हें नई पंचायतों की जिम्मेदारी किस आधार पर सौंपी गई?
● क्या शिकायतों और सुशासन तिहार में मिली जन शिकायतों का कोई महत्व नहीं रह गया है?
● आखिर किसके इशारे पर सात दिन के भीतर पूरा आदेश बदल दिया गया?
● क्या जिला पंचायत प्रशासन इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच कराने को तैयार है?











