करोड़ों का सीएसआर, फिर भी भू-स्थापित सड़कों पर क्यों?, विकास की कीमत कौन चुका रहा, जवाब दें एसईसीएल और अदानी, जमीन गई, जंगल गए, रोजगार कहां? भू-स्थापितों के सवालों से घिरी कंपनियां, सीएसआर के दावे बनाम जमीनी हकीकत, कटघरे में विकास मॉडल
क्या मुनाफे की दौड़ में भू-स्थापितों के अधिकार हो रहे नजरअंदाज?
छत्तीसगढ़/कोरबा;- खनन और ऊर्जा परियोजनाओं से देश की अर्थव्यवस्था को गति देने का दावा करने वाली एसईसीएल और अदानी समूह की परियोजनाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। जिन ग्रामीणों और भू-स्थापित परिवारों ने अपनी जमीन, जंगल और आजीविका का त्याग कर विकास का रास्ता प्रशस्त किया, वही आज अपने अधिकारों के लिए बार-बार आंदोलन करने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दोनों कंपनियां करोड़ों रुपये सीएसआर मद में खर्च करने और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का दावा करती हैं, तो फिर प्रभावित गांवों में असंतोष क्यों बढ़ रहा है? आखिर भू-स्थापित परिवारों को बार-बार धरना-प्रदर्शन और आंदोलन का रास्ता क्यों अपनाना पड़ रहा है? 
विकास का लाभ किसे, विस्थापन का दर्द किसे?
खनन परियोजनाओं के विस्तार के साथ हजारों-लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के दावे भी किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव अपेक्षित रूप से दिखाई नहीं दे रहा। ग्रामीणों का कहना है कि जिस अनुपात में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, उस अनुपात में पर्यावरण संरक्षण के प्रयास नजर नहीं आते।
सीएसआर पर सवाल, लाभार्थी कौन?
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि सीएसआर का वास्तविक लाभ प्रभावित क्षेत्रों और जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। जनहित के कार्यों के लिए सहायता मांगने वाले कई सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों को निराशा हाथ लगती है, जिससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि सीएसआर कहीं केवल औपचारिकता और प्रचार का माध्यम बनकर तो नहीं रह गया है।
अगर सब कुछ ठीक है तो आंदोलन क्यों?
कोरबा जिले में समय-समय पर रोजगार, पुनर्वास, मुआवजा और स्थानीय अधिकारों को लेकर भू-स्थापितों द्वारा किए जा रहे आंदोलन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि जमीनी स्तर पर कई समस्याएं अब भी अनसुलझी हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन लोगों ने विकास के लिए अपनी जमीनें खोईं, क्या उन्हें विकास का समान लाभ मिला ? ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि कहीं विकास के नाम पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की होड़ में स्थानीय जनता के हित पीछे तो नहीं छूट रहे। प्रभावित क्षेत्रों में बढ़ते असंतोष ने प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही और निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
जवाब की प्रतीक्षा में भू-स्थापित
1. यदि सीएसआर प्रभावी है तो असंतोष क्यों?
2. यदि पुनर्वास सफल है तो आंदोलन क्यों?
3. यदि पर्यावरण संरक्षण हो रहा है तो हरित संतुलन क्यों बिगड़ रहा है?
4. यदि विकास सर्वसमावेशी है तो प्रभावित परिवार खुद को उपेक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं?
भू-स्थापित परिवारों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकार, सम्मानजनक पुनर्वास, स्थायी रोजगार, पारदर्शी सीएसआर और पर्यावरणीय संतुलन की मांग कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि एसईसीएल, अदानी समूह और प्रशासन इन सवालों का जवाब केवल कागजों में देते हैं या जमीनी स्तर पर भी इसका असर दिखाई देता है।











