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हसदेव अरण्य में 4.48 लाख पेड़ों की कटाई को मंजूरी, 1742 हेक्टेयर जंगल में खुलेगी नई कोयला खदान

आदिवासियों का विरोध तेज, हाथी कॉरिडोर और जैव विविधता पर मंडराया खतरा, 

अडानी समूह करेगा खनन संचालन, राजस्थान के बिजली संयंत्रों को मिलेगा कोयला

केंद्रीय वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने 8 मई को हुई बैठक में राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) के प्रस्ताव का परीक्षण करने के बाद इसे स्टेज-1 यानी सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान की। यह क्षेत्र सरकार के अपने ‘डिसीजन सपोर्ट सिस्टम’ में हाई कंजर्वेशन जोन के रूप में चिह्नित है, जहां जैव विविधता और वन संरक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व माना गया है।

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अडानी समूह करेगा खनन संचालन

आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में खनन कार्य अडानी समूह द्वारा डेवलपर और ऑपरेटर के रूप में किया जाएगा। यहां से निकाला जाने वाला कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को आपूर्ति किया जाएगा। आरवीयूएनएल को यह कोल ब्लॉक वर्ष 2015 में उसके बिजली संयंत्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवंटित किया गया था।

हसदेव में तीसरी बड़ी खदान

हसदेव अरण्य में यह तीसरी बड़ी कोयला परियोजना होगी। इससे पहले परसा ईस्ट केंते बासन (PEKB) और परसा कोल ब्लॉक (PCB) में खनन कार्य संचालित हो रहा है। गौरतलब है कि कभी हसदेव अरण्य को खनन के लिए ‘नो-गो एरिया’ माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां कई कोयला परियोजनाओं को मंजूरी मिली है।

15 वर्षों में पहले चरण का खनन

एफएसी ने निर्देश दिया है कि खनन दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में 15 वर्षों तक केवल 1,001.95 हेक्टेयर वन भूमि में खनन की अनुमति होगी। दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की मंजूरी पहले चरण में किए गए वनीकरण और जैव विविधता संरक्षण कार्यों की समीक्षा के बाद दी जाएगी।

पेड़ों की कटाई भी चरणबद्ध होगी। पहले पांच वर्षों में लगभग 97,837 पेड़ और अगले पांच वर्षों में 59,712 पेड़ काटे जाएंगे। साथ ही 60 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाले 67,414 पेड़ों को दूसरी जगह प्रतिरोपित करने के निर्देश दिए गए हैं।

हाथी कॉरिडोर पर असर की आशंका

यह कोल ब्लॉक प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व के बफर जोन से चार किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है। राज्य सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि इस क्षेत्र में हाथियों की नियमित आवाजाही होती है। इसके अलावा स्लॉथ भालू, तेंदुआ, भेड़िया, सियार, लकड़बग्घा, बार्किंग डियर और जंगली सूअर जैसे कई महत्वपूर्ण वन्यजीव भी यहां पाए जाते हैं।

वन सलाहकार समिति की बैठक के मिनट्स में उल्लेख किया गया है कि खनन परियोजना का प्रभाव हाथियों की आवाजाही और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर पड़ सकता है। हालांकि इसके लिए वन्यजीव प्रबंधन योजना तैयार कर मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से मंजूरी ली गई है।

आदिवासी समुदायों में नाराजगी

नई खदान को मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब क्षेत्र के आदिवासी समुदाय लंबे समय से हसदेव अरण्य में खनन का विरोध कर रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जंगल उनके जीवन, आजीविका, जल स्रोत और सांस्कृतिक पहचान का आधार है। कई संगठनों ने वन सलाहकार समिति को ज्ञापन सौंपकर इस परियोजना का विरोध भी किया था।

पर्यावरणविदों की चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में से एक है। लगभग 1.75 लाख हेक्टेयर में फैले इस वन क्षेत्र को हाथियों, तेंदुओं और अन्य संरक्षित वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास माना जाता है। यह क्षेत्र हसदेव नदी और बांगो बांध का जलग्रहण क्षेत्र भी है, जिससे लाखों लोगों की जल आवश्यकताएं जुड़ी हुई हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और खनन गतिविधियों से क्षेत्र की जैव विविधता, जल स्रोतों और वन्यजीव गलियारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

विकास बनाम संरक्षण की बहस

सरकार का तर्क है कि राजस्थान के 7,830 मेगावाट क्षमता वाले ताप विद्युत संयंत्रों को हर वर्ष लगभग 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होती है और मौजूदा कोयला खदानें इस मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से अतिरिक्त लगभग 9 मिलियन टन कोयले की जरूरत पूरी होगी।

दूसरी ओर पर्यावरणविद और स्थानीय समुदाय इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में से एक पर बढ़ते दबाव के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में हसदेव अरण्य एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।

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