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“बचपन की टिकट” से 2029 की तैयारी? कोरबा में सरोज पाण्डेय की बढ़ती सक्रियता पर सियासी हलचल

हार के बाद भी नहीं टूटा मोह: कार्यक्रम गैर-राजनीतिक या सियासी प्लानिंग? बचपन की टिकट के बहाने कोरबा में फिर सक्रिय सरोज पांडे

छत्तीसगढ़/कोरबा :- “बचपन की टिकट”… भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष Saroj Pandey का यह कार्यक्रम इन दिनों कोरबा की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन है या इसके जरिए 2029 के लोकसभा चुनाव की जमीन तैयार की जा रही है?

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12 अप्रैल 2026 की शाम को कोरबा शहर के अशोक वाटिका में महिलाओं के लिए पारंपरिक खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया है। आयोजन भले ही “सखी सहेली महिला समूह” के नाम से किया जा रहा हो, लेकिन इसके पीछे की रणनीति और सोच को लेकर राजनीतिक हलकों में सरोज पाण्डेय का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।

कोरबा जिले में उनकी लगातार सक्रियता यह संकेत दे रही है कि 2029 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक एजेंडे में शामिल है। जबकि चुनाव में अभी तीन साल का वक्त बाकी है, लेकिन उनकी बढ़ती मौजूदगी कई तरह के संकेत दे रही है। 10 अप्रैल को ग्राम खरवानी में उनकी मौजूदगी भी इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।

गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कोरबा सीट से सरोज पाण्डेय को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी Jyotsna Mahant के हाथों 43 हजार से अधिक मतों से हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के दौरान उनका एक बयान—“कौन ज्योत्सना महंत?”—काफी चर्चित रहा, जिसे बाद में उनके अति-आत्मविश्वास के तौर पर देखा गया। अंततः यही चुनावी समीकरण उनके खिलाफ गया और उन्हें हार झेलनी पड़ी।

इसके बावजूद हार के बाद भी उनका कोरबा से संपर्क लगातार बना हुआ है। अब उनकी हालिया सक्रियता और “बचपन की टिकट” जैसे आयोजनों को लेकर यह माना जा रहा है कि वे एक बार फिर कोरबा लोकसभा सीट से दावेदारी की तैयारी में हैं। उनके करीबी भी इस ओर इशारा करते नजर आते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में टिकट वितरण को लेकर हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है। पार्टी प्रयोगों के लिए जानी जाती है, ऐसे में 2029 में क्या समीकरण बनेंगे यह अभी कहना मुश्किल है। फिर भी सरोज पाण्डेय का लगातार जुड़ाव यह जरूर दर्शाता है कि वे इस सीट को लेकर गंभीर हैं।

इसी बीच “बचपन की टिकट” कार्यक्रम को लेकर एक और विवाद सामने आया है। अशोक वाटिका को 10 अप्रैल से 14 अप्रैल तक पूरी तरह बंद कर दिया गया है। यह स्थान ऑक्सीजन जोन के रूप में जाना जाता है, जहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग मॉर्निंग वॉक, योग और व्यायाम के लिए पहुंचते हैं। अचानक बंद होने से आम लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह निर्णय किसके आदेश से लिया गया और इसकी जिम्मेदारी कौन ले रहा है—इस पर अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।

हालांकि होटल इन गणेश में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस कार्यक्रम को पूरी तरह गैर-राजनीतिक बताया गया, लेकिन कार्यक्रम में भाजपा से जुड़े पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या “बचपन की टिकट” जैसे आयोजनों के जरिए सरोज पाण्डेय को 2029 में फिर से कोरबा से टिकट मिल पाती है और अगर मिलती है तो क्या वे इस बार जीत का स्वाद चख पाएंगी। साथ ही स्थानीय नेताओं का समर्थन उनके पक्ष में कितना खड़ा होता है, यह भी आने वाले समय में साफ होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि कोरबा की सियासत में उनकी सक्रियता ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

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