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करोड़ों मामले लंबित, न्याय में देरी पर जवाबदेही जरूरी: वर्षों से न्यायालय कार्यालय में जमे कर्मचारियों की पोस्टिंग और कार्यप्रणाली की भी हो निष्पक्ष समीक्षा

देश में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित, छत्तीसगढ़ में भी पुराने प्रकरणों का बोझ; लोक अदालत, फास्ट ट्रैक और मध्यस्थता के बावजूद समयबद्ध न्याय पर जोर जरूरी

नई दिल्ली/छत्तीसगढ़ :-  देश की न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की संख्या लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के वर्तमान आंकड़ों के अनुसार जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 5.12 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी बड़ी संख्या में प्रकरण लंबित हैं। केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई हालिया जानकारी के अनुसार उच्च न्यायालयों में हजारों मामले दशकों पुराने हैं। लंबित मामलों के निराकरण के लिए देश में नियमित न्यायालयों के साथ लोक अदालत, स्थायी लोक अदालत, मध्यस्थता, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, विशेष न्यायालय और ई-कोर्ट जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और उपयुक्त मामलों का शीघ्र निराकरण सुनिश्चित करना है।

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लोक अदालतों से बड़े पैमाने पर मामलों का निराकरण

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से समय-समय पर राष्ट्रीय लोक अदालतों का आयोजन किया जाता है। लोक अदालतों में न्यायालयों में लंबित तथा प्री-लिटिगेशन मामलों को आपसी समझौते के आधार पर निपटाने का अवसर मिलता है। छत्तीसगढ़ में भी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से राष्ट्रीय लोक अदालतें आयोजित की जा रही हैं। वर्ष 2026 के लिए छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय लोक अदालतों की तिथियां 14 मार्च, 9 मई, 12 सितंबर और 12 दिसंबर निर्धारित की गई हैं। 14 मार्च की राष्ट्रीय लोक अदालत में राज्य में बड़े पैमाने पर मामलों के निराकरण की जानकारी दी गई, जबकि 9 मई की राष्ट्रीय लोक अदालत में भी लाखों प्रकरणों के निराकरण की जानकारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने जारी की है। लोक अदालत की सफलता यह दर्शाती है कि समझौते योग्य मामलों के लिए वैकल्पिक न्याय व्यवस्था लंबित मामलों का बोझ कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष न्यायालय भी व्यवस्था का हिस्सा

गंभीर एवं विशेष श्रेणी के मामलों के शीघ्र निराकरण के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की व्यवस्था लागू है। इसके अलावा महिलाओं और बच्चों से संबंधित विशेष मामलों सहित विभिन्न श्रेणियों के मामलों के लिए विशेष न्यायालय भी कार्यरत हैं। इनका उद्देश्य सामान्य न्यायालयों पर दबाव कम करने के साथ संबंधित मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निराकरण करना है।

मध्यस्थता से विवादों का वैकल्पिक समाधान

हर विवाद का समाधान लंबी अदालती प्रक्रिया के माध्यम से ही हो, यह आवश्यक नहीं है। मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान की व्यवस्थाओं का उद्देश्य पक्षकारों की सहमति से विवाद का समाधान कराना है। इससे न्यायालयों पर मामलों का बोझ कम होने के साथ पक्षकारों का समय और खर्च भी बच सकता है।

ई-कोर्ट से प्रक्रिया में पारदर्शिता

ई-कोर्ट परियोजना के माध्यम से केस स्टेटस, ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और अन्य तकनीकी सुविधाओं का विस्तार किया गया है। न्याय विभाग के अनुसार डिजिटल न्यायिक व्यवस्था का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुगम और प्रभावी बनाना है।

न्यायालयीन कर्मचारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

न्यायाधीश न्यायिक आदेश पारित करते हैं, लेकिन न्यायालय की प्रशासनिक प्रक्रिया में न्यायालयीन कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रिकॉर्ड का रखरखाव, दस्तावेजों की प्रविष्टि, नकल शाखा से संबंधित कार्य, नोटिस और समन की प्रक्रिया, आदेशों की प्रतियां तथा फाइलों का प्रशासनिक संचालन जैसे कार्य न्यायालयीन व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए किसी मामले में न्यायिक आदेश के बाद होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई भी समयबद्ध रहना जरूरी है। यदि किसी स्तर पर अनावश्यक विलंब होता है तो उसका प्रभाव पूरे मामले की गति पर पड़ सकता है।

वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों की प्रशासनिक समीक्षा

कई स्थानों पर लंबे समय से एक ही न्यायालय या शाखा में कार्यरत कर्मचारियों को लेकर फरियादियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। किसी कर्मचारी का लंबे समय तक एक स्थान पर पदस्थ होना अपने आप में अनियमितता नहीं है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से लंबे कार्यकाल, संवेदनशील शाखाओं में लगातार पदस्थापना और प्राप्त शिकायतों की स्थिति की समय-समय पर समीक्षा किया जाना उचित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ओर से न्यायिक व्यवस्था में स्थानांतरण संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार स्थानांतरण की प्रक्रिया संचालित होती है। न्यायालयीन कर्मचारियों के संबंध में लागू सेवा नियमों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का पालन संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। जहां किसी कर्मचारी का कार्यकाल, पदस्थापना या कार्य-विभाजन नियमों के अनुसार समीक्षा योग्य हो, वहां निर्धारित प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाना चाहिए।

नियमों का पालन ही पारदर्शी व्यवस्था की आधारशिला

न्याय व्यवस्था में नियम और दिशा-निर्देश केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहने चाहिए। उनका वास्तविक पालन ही न्यायालयीन प्रशासन को प्रभावी बनाता है। न्यायिक अधिकारियों से संबंधित प्रशासनिक निर्णय सामान्यतः संबंधित उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष के अधीन होते हैं। अधीनस्थ न्यायालयों के प्रशासन और कर्मचारियों से संबंधित विषयों में भी उच्च न्यायालय तथा निर्धारित सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी अपने नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करते हैं। इसलिए किसी कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई भी निर्धारित नियमों और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिए। शिकायत मिलने पर रिकॉर्ड के आधार पर जांच, दोष पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई और शिकायत निराधार होने पर कर्मचारी को संरक्षण—तीनों पहलुओं का पालन आवश्यक है।

फाइल की गति की निगरानी से कम हो सकती है देरी

डिजिटल न्याय व्यवस्था के दौर में पुराने मामलों की फाइल-मूवमेंट और प्रशासनिक कार्रवाई की समयबद्ध निगरानी को मजबूत किया जा सकता है। किसी मामले में आदेश के बाद अगली प्रशासनिक प्रक्रिया कब पूरी हुई, नोटिस या समन कब जारी हुआ, दस्तावेज कब रिकॉर्ड में शामिल हुए और फाइल किस चरण में है, इसकी निगरानी से अनावश्यक विलंब की पहचान संभव है। इससे किसी कर्मचारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय रिकॉर्ड के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि देरी किस स्तर पर हुई।

छत्तीसगढ़ में क्लोजर रिपोर्ट की लंबित स्थिति भी बनी चुनौती

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के समक्ष जुलाई 2026 में पुलिस जांच पूरी होने के बावजूद क्लोजर रिपोर्ट लंबित रहने से जुड़े 1,45,097 मामलों की स्थिति सामने आई थी। हाईकोर्ट ने इस संबंध में पुलिस महानिदेशक से ताजा स्थिति रिपोर्ट मांगी थी। यह स्थिति बताती है कि न्याय में तेजी के लिए केवल न्यायालय के स्तर पर ही नहीं, बल्कि पुलिस जांच, अभियोजन, रिकॉर्ड और अन्य संबंधित प्रक्रियाओं में भी समयबद्धता आवश्यक है।

पुराने मामलों के लिए समन्वित कार्रवाई जरूरी

लंबित मामलों के शीघ्र निराकरण के लिए न्यायपालिका, विधिक सेवा संस्थाएं, पुलिस, अभियोजन और न्यायालयीन प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। जिन मामलों का निपटारा लोक अदालत या मध्यस्थता के माध्यम से संभव है, उन्हें संबंधित प्रक्रिया में ले जाने और गंभीर मामलों को निर्धारित प्राथमिकता के अनुसार आगे बढ़ाने से नियमित अदालतों पर बोझ कम किया जा सकता है। इसी के साथ न्यायालयीन कर्मचारियों की पदस्थापना, कार्य-विभाजन, रिकॉर्ड प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों में लागू नियमों एवं दिशा-निर्देशों का पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

फरियादी के हित में जवाबदेही जरूरी

अदालत में आने वाला प्रत्येक फरियादी समय और धन खर्च करके न्याय की उम्मीद लेकर आता है। लंबे समय तक चलने वाला मुकदमा उसके लिए आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का बोझ बन सकता है। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में अनावश्यक विलंब रोकना जरूरी है। जहां न्यायालयीन स्तर पर कोई प्रशासनिक देरी हो, वहां सक्षम प्राधिकारी द्वारा रिकॉर्ड के आधार पर उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। शिकायतों का निपटारा भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत समयबद्ध तरीके से होना चाहिए।

न्याय में तेजी के लिए व्यवस्था का प्रभावी पालन जरूरी

देश में लंबित मामलों की बड़ी संख्या के बीच लोक अदालत, मध्यस्थता, फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष न्यायालय और ई-कोर्ट जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण साधन हैं। इनका प्रभाव तभी पूरी तरह दिखाई देगा जब संबंधित नियमों, दिशा-निर्देशों और समयबद्ध प्रक्रियाओं का नियमित रूप से पालन हो। छत्तीसगढ़ में भी पुराने मामलों की पहचान, उपयुक्त मामलों को वैकल्पिक विवाद समाधान के माध्यम से निपटाना, न्यायालयीन प्रशासन की नियमित समीक्षा और लंबे समय से पदस्थ कर्मचारियों के संबंध में लागू नियमों के अनुसार प्रशासनिक निर्णय लेने से न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

न्यायिक प्रक्रिया में किसी एक स्तर की देरी पूरे मामले को प्रभावित कर सकती है। इसलिए न्यायाधीशों की उपलब्धता से लेकर न्यायालयीन कर्मचारियों, पुलिस, अभियोजन और वैकल्पिक विवाद समाधान तक पूरी व्यवस्था में नियमों का पालन और जवाबदेही सुनिश्चित होना समय पर न्याय के लिए आवश्यक है।

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