छत्तीसगढ़/कोरबा :- ऊर्जा नगरी और औद्योगिक नगरी के नाम से पहचाने जाने वाले कोरबा जिले में धान उपार्जन व्यवस्था की जमीनी हकीकत प्रशासनिक दावों की पोल खोल रही है। करोड़ों रुपये के CSR फंड, एशिया की सबसे बड़ी गेवरा कोल माइंस, और लगभग 800 करोड़ रुपये के DMF फंड के बावजूद जिले के कई धान उपार्जन केंद्र बदहाल स्थिति में संचालित हो रहे हैं। 
सबसे चौंकाने वाली तस्वीर कराई नारा धान उपार्जन केंद्र से सामने आई है, जहां केंद्र का ऑफिस मुक्तिधाम के प्रतीक्षालय भवन में संचालित किया जा रहा है। धान उपार्जन केंद्र के ठीक बगल में चिता जलती रहती है, और उसी स्थान पर किसानों की मेहनत का धान तौला और खरीदा जा रहा है। यह दृश्य न केवल प्रशासनिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि जिले की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
हाथी प्रभावित क्षेत्रों में जान जोखिम में डालकर ड्यूटी
जिले के कई धान उपार्जन केंद्र हाथी प्रभावित वनांचल क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां न तो बाउंड्रीवॉल है और न ही रात में जंगली जानवरों से बचाव की कोई ठोस व्यवस्था। कई केंद्रों में कर्मचारी पन्नी के तंबुओं में रात गुजारने को मजबूर हैं।
अगर रात के समय हाथी या अन्य जंगली जानवर धान खाने आ जाएं, तो कर्मचारियों की जान पर सीधा खतरा मंडराता है।
अधूरे सेड, उड़ती धूल और बारिश में धान भीगने की संभावना
कई धान उपार्जन केंद्रों में:
-
सेड (चबूतरे) या तो अधूरे हैं या या फिर कम बने हुए हैं
-
खुले मैदान में धान रखने से धूल-मिट्टी का गुबार
-
अचानक बारिश होने पर धान भीगने और सड़ने का खतरा
इससे एक ओर किसानों की सालभर की मेहनत पर पानी फिरने की आशंका बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर शासन के करोड़ों रुपये के नुकसान की स्थिति भी स्वाभाविक है।
कागजों में विकास, ज़मीन पर अव्यवस्था
सरकार किसानों के हित में बड़े-बड़े दावे और योजनाएं गिनाती है, लेकिन धान उपार्जन केंद्रों की हालत यह बताने के लिए काफी है कि कागजों का विकास जमीन तक नहीं पहुंच पा रहा। हर वर्ष इन्हीं केंद्रों से किसानों का धान खरीदा जाता है, फिर भी वर्षों से व्यवस्थाओं में सुधार क्यों नहीं हुआ?
किसकी लापरवाही ?
अब सवाल यह है कि—
-
क्या संबंधित अधिकारी मॉनिटरिंग नहीं कर रहे?
-
या फिर नीचे से ऊपर तक समस्याएं पहुंच ही नहीं पा रहीं?
-
या फिर करोड़ों के फंड के बावजूद इच्छाशक्ति की कमी है?
वजह जो भी हो, लेकिन दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में स्थित धान उपार्जन केंद्रों की स्थिति दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही है।
जिला प्रशासन को संज्ञान लेने की जरूरत
यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, कर्मचारियों की सुरक्षा और शासन के पैसों से जुड़ा गंभीर मामला है। अब जरूरत है कि जिला प्रशासन मौके पर जाकर इन केंद्रों की स्थिति का वास्तविक निरीक्षण करे और जल्द से जल्द ठोस सुधारात्मक कदम उठाए।
















