छत्तीसगढ़/कोरबा :- भौतिक सुख-सुविधाओं से भरे इस आधुनिक युग में जहां इंसान छोटी-छोटी परेशानियों में हार मान लेता है, वहीं कोरबा शहर में एक ऐसा हठयोगी भी है जिसने अपने जीवन के 15 वर्ष कठोर तप, त्याग और अटूट संकल्प को समर्पित कर दिए। यह कहानी है किशन शिल्क कुमार की—जो न सिर्फ हठयोग के साधक हैं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और भारतीय संस्कृति के प्रहरी बनकर सामने आए हैं। 
“2010 से शुरू हुई तपस्या, आज भी अडिग संकल्प”
कोरबा के मुख्य डाकघर के पास स्थित अपने घर में वर्ष 2010 से किशन शिल्क कुमार हठयोग की कठिन साधना कर रहे हैं।
लगभग 15 वर्षों की इस तपस्या में उनकी जटाएं बढ़कर करीब 3.5 किलो वजन की हो चुकी हैं, हाथ-पैरों के नाखून अत्यधिक लंबे हो गए हैं और लंबी दाढ़ी उनके तपस्वी स्वरूप को और भी विलक्षण बना देती है।
भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड—उनके संकल्प में कभी कोई कमी नहीं आई।

“पहली नजर में भ्रम, लेकिन भीतर छिपा है असाधारण तपस्वी”
कोसाबाड़ी स्थित हनुमान मंदिर के गेट पर हनुमान जयंती के दिन जब लोग उन्हें देखते हैं, तो एक पल के लिए उन्हें सामान्य या असामान्य व्यक्ति समझ बैठते हैं।
लेकिन जब पास जाकर उनकी जीवन यात्रा को समझा जाता है, तो यह एहसास होता है कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और तप का जीवंत उदाहरण है।
“सामान्य जीवन से तपस्वी बनने तक का सफर”
किशन शिल्क कुमार बताते हैं कि उन्होंने भी बचपन तक सामान्य जीवन जिया। किशोरावस्था में वे रायपुर स्थित विश्व हिंदू परिषद कार्यालय से जुड़े और स्वर्गीय दामोदर रामदेव जी के साथ सहयोगी के रूप में कार्य किया।
इस दौरान उनके भीतर देशभक्ति, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण की भावना गहराई से जागृत हुई।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े रहे।
स्वर्गीय दामोदर रामदेव जी के निधन के बाद वे कोरबा लौट आए और यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प शुरू हुआ।
“राम मंदिर संकल्प और 15 वर्षों की कठिन साधना”
उन्होंने संकल्प लिया कि अयोध्या में राम मंदिर में कलश स्थापना तक वे सार्वजनिक जीवन में नहीं आएंगे।
इसी संकल्प के साथ 2010 से उन्होंने हठयोग शुरू किया।
इस दौरान उन्होंने लगभग 8 वर्षों तक सूर्य का प्रकाश तक नहीं देखा और अपने शरीर पर सूर्य की किरणें नहीं पड़ने दीं।
आज भी वे 24 घंटे खड़े रहकर मंत्र जाप करते हैं।
कभी-कभी 1–2 घंटे के लिए तखत या चारपाई पर बैठने का अवसर मिलता है।
भोजन के रूप में वे दिन में सिर्फ एक बार, जो भी मिल जाए, वही ग्रहण करते हैं।
“2025 में संकल्प पूर्ण, लेकिन साधना जारी”
25 नवंबर को अयोध्या राम मंदिर में कलश स्थापना के साथ उनका एक बड़ा संकल्प पूरा हुआ, लेकिन उनका जीवन लक्ष्य अभी समाप्त नहीं हुआ है।
अब वे गंगा-यमुना के तट पर आगे की साधना करना चाहते हैं।
उनका संकल्प है कि—
- बड़े नाखूनों को दक्षिण भारत में नरसिंह भगवान के नाम पर विसर्जित करेंगे
- और अपनी जटाओं को कैलाश मानसरोवर में समर्पित करेंगे
“शिक्षित साधक: पत्रकार बनने का था सपना”
किशन शिल्क कुमार केवल साधक ही नहीं, बल्कि एक शिक्षित युवा भी हैं।
उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे से बीए, बीजेएमसी (जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन) की पढ़ाई की है।
उनकी इच्छा एक पत्रकार बनकर समाज की सेवा करने की थी, लेकिन बाद में उन्होंने हठयोग के माध्यम से समाज और प्रकृति की सेवा को ही अपना जीवन उद्देश्य बना लिया।
“प्रकृति के लिए चेतावनी और संदेश”
उनका मानना है कि आज मनुष्य प्रकृति का अत्यधिक दोहन कर रहा है, जिसके कारण दुनिया में असंतुलन बढ़ रहा है और युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं।
वे कहते हैं—
“अगर इंसान प्रकृति और अपनी संस्कृति को नहीं बचाएगा, तो आने वाला समय और भी भयावह होगा।”
उनकी तपस्या केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि समाज के लिए एक जागरण संदेश है।
“संघर्षों से भरा तपस्वी जीवन”
- 13 वर्षों तक घर से बाहर नहीं निकले
- 13 वर्षों बाद ही सार्वजनिक रूप से बाहर आना शुरू किया
- बड़े नाखूनों के कारण सीढ़ियों पर उल्टा चढ़ना-उतरना पड़ता है
- लोग कई बार उन्हें पागल समझ लेते हैं
- ठंड में भी शरीर पूरी तरह ढक नहीं पाते
2018 में पिता के निधन के बाद उन्होंने और कठोर तपस्या शुरू की और अब 24 घंटे में एक बार भोजन ग्रहण कर जीवन यापन करते हैं।
“परिवार और पृष्ठभूमि”
किशन शिल्क कुमार वर्तमान में अपने घर में अकेले रहते हैं। उनके बड़े भाई पश्चिम बंगाल में एक पावर प्लांट में कार्यरत हैं।
रिहायशी इलाके में उनका मकान होने के कारण उनकी तपस्या में कई बार बाधाएं आती हैं।
इसलिए वे शासन-प्रशासन से एकांत स्थान उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनकी साधना बिना किसी परेशानी के जारी रह सके।
“अब मंदिरों में जाकर कर रहे जनकल्याण की प्रार्थना”
अब वे समय-समय पर धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं।महाशिवरात्रि के अवसर पर दुर्पा रोड स्थित काली मंदिर में जाना शुरू किया है, जहां वे देश और समाज के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं।
“गिनीज और लिम्का बुक में नाम दर्ज कराने की इच्छा”
अपनी इस अद्भुत साधना को वे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और लिम्का बुक में दर्ज कराना चाहते हैं, लेकिन प्रक्रिया की जानकारी न होने के कारण आगे नहीं बढ़ पाए हैं। इसके लिए वे शासन-प्रशासन से सहयोग की अपेक्षा कर रहे हैं।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर लक्ष्य उच्च हो और इच्छाशक्ति अडिग, तो इंसान असंभव को भी संभव बना सकता है।
हठयोग का वास्तविक अर्थ है—अपने शरीर, मन और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए उच्च उद्देश्य के लिए जीवन समर्पित करना।













