छत्तीसगढ़/कोरबा :- शासन की बिहान योजना के तहत स्व-सहायता समूह की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से जिला पंचायत परिसर के पास दुकानें आवंटित की गई थीं, ताकि वे सम्मानजनक ढंग से अपना रोजगार संचालित कर सकें। लेकिन वर्तमान में इन दुकानों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि हर वर्ष बारिश के मौसम में महिलाओं को दुकान के भीतर जमा होने वाला पानी निकालते हुए अपना कारोबार चलाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 
महिलाओं का कहना है कि दुकानों की छत से लगातार पानी टपकता है, जबकि कई स्थानों पर छज्जे भी टूटकर गिर रहे हैं। इससे न केवल उनके सामान को नुकसान पहुंचता है, बल्कि हर समय दुर्घटना का भी खतरा बना रहता है। यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार बनी हुई है। इसके बावजूद अब तक स्थायी मरम्मत या सुधार के लिए प्रभावी पहल नहीं की गई है। 
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी दिनेश नाग ने आखिर इन दुकानों की वास्तविक स्थिति का कभी निरीक्षण किया या नहीं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इन दुकानों की मरम्मत कराई जाती तो समूह की महिलाओं को हर साल बारिश के दौरान ऐसी परेशानी नहीं झेलनी पड़ती। 
इधर हाल ही में जिला पंचायत परिसर के पास फेंसिंग कराई गई है। हालांकि इस कार्य की उपयोगिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि फेंसिंग के कारण जहां लोगों के गिरने और घायल होने का डर बना रहता है वही कलेक्ट्रेट और जिला पंचायत आने वाले दोपहिया एवं चारपहिया वाहन चालकों को आवाजाही में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही, कलेक्ट्रेट के दूसरे गेट के सामने पूर्व में घोषित नो-पार्किंग क्षेत्र में अब अव्यवस्थित तरीके से वाहनों की पार्किंग होने लगी है, जिससे यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। 
लोगों का मानना है कि यदि फेंसिंग जैसे कार्यों पर ध्यान देने के बजाय समूह की महिलाओं की दुकानों की मरम्मत, छत और छज्जों की सुरक्षा तथा बंद पड़ी दुकानों को पुनः संचालित कराने की दिशा में पहल की जाती, तो इसका सीधा लाभ जरूरतमंद महिलाओं को मिलता। 
अब सवाल यह है कि शासन की महत्वाकांक्षी बिहान योजना से जुड़ी इन महिलाओं की समस्याओं का समाधान कब होगा? क्या जिला पंचायत प्रशासन उनकी तकलीफों को समझते हुए जर्जर दुकानों की मरम्मत कराएगा और बंद पड़ी दुकानों को फिर से जीवंत बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा, या फिर महिलाएं हर साल बारिश में पानी उलीचते हुए अपना रोजगार चलाने को विवश रहेंगी? 











