कस्टम मिलिंग नीति के तहत धान रीसाइक्लिंग की शिकायतों के बाद मार्कफेड के फैसले से कोरबा सहित प्रदेशभर में हड़कंप मचा हुआ है किसान, समिति, ट्रांसपोर्टर सभी परेशान
छत्तीसगढ़/कोरबा :- राज्य में धान खरीदी अभियान के अंतिम चरण में व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। कस्टम मिलिंग उपार्जन नीति के तहत प्रदेश के कई जिलों में धान के रीसाइक्लिंग की शिकायतें सामने आने के बाद मार्कफेड ने 13 जनवरी से आगामी आदेश तक समितियों से धान के उठाव पर रोक लगा दी है। इसका सीधा असर किसानों, सहकारी समितियों और राइस मिलर्स पर पड़ रहा है। मिलर मॉड्यूल में पेज ओपन करते ही उठाव पर रोक की जानकारी प्रदर्शित हो रही है, जिससे पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा हुआ है।
धान बेचने के लिए पहले ही एग्रिस्टैक पोर्टल में पंजीयन, डिजिटल क्रॉप सर्वे (गिरदावरी), सत्यापन और टोकन जैसी जटिल प्रक्रियाओं से किसान परेशान हैं। अब समिति स्तर पर खरीदे जा चुके धान के लिए राइस मिलर्स को डीओ (डिलीवरी ऑर्डर) जारी होने के बावजूद उठाव पर प्रतिबंध लगने से संकट और गहरा गया है।
कोरबा जिले को इस वर्ष 31 लाख 19 हजार क्विंटल धान खरीदी का लक्ष्य दिया गया था। जिले की 41 समितियों के अंतर्गत संचालित 65 उपार्जन केंद्रों में लाखों क्विंटल धान जाम पड़ा हुआ है। उठाव नहीं होने से जहां समिति प्रबंधकों और केंद्र प्रभारियों की परेशानियां बढ़ गई हैं, वहीं कई केंद्रों में जगह की कमी के कारण किसानों को धान विक्रय में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई उपार्जन केंद्रों में पिछले एक माह से धान का उठाव पूरी तरह ठप है। रकबा त्रुटि के चलते कई किसानों के टोकन भी अब तक नहीं कट पाए हैं।
मार्कफेड द्वारा राइस मिलर्स को जारी किए गए डीओ के आधार पर ही धान का परिवहन होता है। समितियों द्वारा ऑनलाइन गेट पास जारी किए जाने के बाद ही वाहन धान उठाव के लिए प्रवेश कर पाते हैं। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए गेट पास में वाहन नंबर और फोटो तक अटैच रहते हैं। लेकिन राज्य शासन द्वारा उठाव पर रोक लगाए जाने से गेट पास जारी नहीं हो पा रहा है। स्थिति यह है कि ऑनलाइन बारदाना तक जारी नहीं किया जा सका है।
धान उठाव नहीं होने से आर्थिक नुकसान केवल समितियों को ही नहीं, बल्कि राइस मिलर्स को भी उठाना पड़ रहा है। मिलर्स ने दो माह की अवधि के लिए दर्जनों वाहन किराए पर हायर कर रखे हैं। उनके कई डीओ पेंडिंग पड़े हैं, जिनके एवज में धान का उठाव होना था। उठाव नहीं होने की स्थिति में मिलर्स को भारी आर्थिक क्षति झेलनी पड़ सकती है।
वहीं उपार्जन केंद्रों में धान का भंडारण लंबा खिंचने से केंद्र प्रभारियों और प्रबंधकों पर धान की सुरक्षा का अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। सबसे गंभीर स्थिति हाथी प्रभावित क्षेत्रों में बनी हुई है, जहां धान के भंडारित स्टॉक पर हाथियों से नुकसान का खतरा लगातार बना हुआ है।
कुल मिलाकर, धान खरीदी अभियान के अंतिम दौर में लिया गया यह फैसला किसानों की सुविधा, समितियों की कार्यप्रणाली और राइस मिलर्स की आर्थिक स्थिरता—तीनों पर भारी पड़ता दिख रहा है। अब सभी की निगाहें शासन और मार्कफेड के आगामी आदेश पर टिकी हैं, जिससे इस संकट का समाधान निकल सके।

















