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“व्यवस्था सुधरे वरना जान दे देंगे” — बुजुर्गों की चेतावनी के बाद भी पलटे बयान? समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों की जांच पर उठे गंभीर सवाल

स्नेह सदन वृद्धाश्रम की शिकायत लेकर कलेक्टर जनदर्शन पहुंचे बुजुर्ग, जांच रिपोर्ट में बदल दिए गए बयान का आरोप; उप संचालक की भूमिका पर घिरा समाज कल्याण विभाग

छत्तीसगढ़/कोरबा :- जीवन की संध्या में सहारे और सम्मान की उम्मीद लेकर वृद्धाश्रम पहुंचने वाले बुजुर्ग जब व्यवस्था की अव्यवस्थाओं से परेशान होकर प्रशासन की चौखट पर पहुंचते हैं और उनकी पीड़ा ही सरकारी कागजों में बदल दी जाती है, तो यह पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। कोरबा में स्नेह सदन वृद्धाश्रम से जुड़ा ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां शिकायत करने वाले बुजुर्गों के बयान को ही जांच प्रतिवेदन में बदल दिए जाने का आरोप समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों पर लग रहा है।

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दरअसल 5 जनवरी 2026 को बुजुर्ग सहदेव चौहान और पदुमलाल डिक्सेना कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचे थे। उन्होंने लिखित शिकायत देकर बताया था कि वे लगभग 8 माह से समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित स्नेह सदन वृद्धाश्रम में रह रहे हैं, लेकिन वहां की स्थिति बेहद खराब है।

बुजुर्गों ने अपनी शिकायत में बताया था कि आश्रम में खाने-पीने की समुचित व्यवस्था नहीं है, कर्मचारियों का व्यवहार अपमानजनक है और कई बार मारपीट तक की स्थिति बन जाती है। इसके अलावा आश्रम में सामग्री की हेराफेरी होने का भी आरोप उन्होंने लगाया था।

शिकायत पत्र में दोनों बुजुर्गों ने प्रशासन से भावुक अपील करते हुए कहा था कि यदि उन्हें किसी दूसरे वृद्धाश्रम में स्थानांतरित नहीं किया गया तो वे आत्महत्या करने तक मजबूर हो सकते हैं। बुजुर्गों की इस चेतावनी को गंभीर मानते हुए कलेक्टर ने मामले की जांच के लिए समाज कल्याण विभाग के उप संचालक हरीश सक्सेना और सहायक कलेक्टर क्षितिज गुरभेले को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे।

जनदर्शन से निकलने के बाद दोनों बुजुर्ग प्रशांति वृद्धाश्रम पहुंच गए, जहां स्थानीय पार्षद के आग्रह पर उन्हें अस्थायी रूप से आश्रय दिया गया। उसी दिन देर शाम उप संचालक हरीश सक्सेना और सहायक कलेक्टर क्षितिज गुरभेले प्रशांति वृद्धाश्रम पहुंचे और दोनों बुजुर्गों के बयान दर्ज किए।

बताया जाता है कि उस समय बुजुर्गों ने वही बातें दोहराईं जो उन्होंने अपने शिकायत पत्र में लिखी थीं। लेकिन जब जांच प्रतिवेदन सामने आया तो उसमें दर्ज तथ्य पूरी तरह अलग बताए गए।

जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि दोनों बुजुर्गों ने स्नेह सदन वृद्धाश्रम की व्यवस्था को “बहुत अच्छा” बताया है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में प्रशांति वृद्धाश्रम के केयरटेकर बीरू यादव के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी का भी जिक्र कर दिया गया।

यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है, क्योंकि बुजुर्गों ने जनदर्शन में शिकायत स्नेह सदन वृद्धाश्रम की अव्यवस्थाओं को लेकर की थी, न कि प्रशांति वृद्धाश्रम या उसके केयरटेकर के खिलाफ।

मामले को लेकर प्रशांति वृद्धाश्रम के केयरटेकर बीरू यादव और नवदृष्टि समाजसेवी संस्था ने जांच प्रतिवेदन पर लिखित आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे तथ्यों से छेड़छाड़ और बुजुर्गों की शिकायत को दबाने की कोशिश बताया है।

जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मान और सुरक्षा की उम्मीद रखने वाले बुजुर्गों की पीड़ा यदि प्रशासनिक कागजों में ही बदल दी जाए, तो यह न केवल व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न है, बल्कि जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर संदेह पैदा करता है।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर वास्तविक सच्चाई सामने लाता है या नहीं, ताकि बुजुर्गों को न्याय मिल सके और वृद्धाश्रमों की व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब भी सामने आ सके।   

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