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छत्तीसगढ़ में जिला पंचायत उप-संचालक पद वर्षों से रिक्त: प्रभारी व्यवस्था पर टिकी है जिला प्रशासन की रीढ़

 छत्तीसगढ़/रायपुर :- राज्य के जिला पंचायतों में उप-संचालक, जिला पंचायत जैसे प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े हैं। विडंबना यह है कि इन पदों के लिए स्वीकृति तो वर्षों पहले ही मिल चुकी है, मगर 2014 के बाद से अब तक स्थायी नियुक्ति की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। परिणामस्वरूप जिलों में शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभारी अधिकारियों के हवाले है।

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स्थायी नियुक्ति के अभाव में कार्यों पर असर
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधीन आने वाले इन पदों के रिक्त रहने से योजनाओं के पर्यवेक्षण, मूल्यांकन और अमल में लगातार बाधा आ रही है। कोरबा, रायगढ़, बिलासपुर, सरगुजा और कांकेर जैसे प्रमुख जिलों में उप-संचालक या तो पदस्थ नहीं हैं या प्रभारी अधिकारियों के भरोसे विभाग चल रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, 2014 में कुछ स्थानांतरण और पदोन्नति जरूर हुई थी, लेकिन उसके बाद से नियुक्तियों पर चुप्पी है।

जवाबदेही और पारदर्शिता पर उठते सवाल
वर्तमान में कई जिलों में अधिकारी एक से अधिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, जिससे कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों प्रभावित हो रही है। ऐसे में जमीनी स्तर पर योजनाओं की प्रभावशीलता भी सवालों के घेरे में है।

मलाईदार पद, प्रभारी अधिकारी नहीं छोड़ना चाहते कुर्सी
यह भी एक विडंबना है कि उप-संचालक का पद “मलाईदार विभाग” की श्रेणी में आता है, जिसकी वजह से प्रभारी अधिकारी इस पद से हटना नहीं चाहते। कई बार तो शासन द्वारा स्थानांतरण अथवा कार्यमुक्ति के आदेशों को भी नजरअंदाज कर कुर्सी से चिपके रहने की कोशिशें होती हैं। यह प्रवृत्ति न केवल प्रशासनिक अनुशासन को प्रभावित करती है, बल्कि व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत
राज्य सरकार को चाहिए कि उप-संचालकों की नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाकर स्थायी अधिकारियों की पदस्थापना सुनिश्चित करे, ताकि जिला पंचायतों में योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक प्रभावशाली और पारदर्शी तरीके से हो सके।

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