जामुन का सेवन लाभकारी, बेल से करें परहेज • उबालकर पानी पीने, हल्का भोजन और नियमित योग-व्यायाम अपनाने की अपील
छत्तीसगढ़/कोरबा :- हिंदी पंचांग के अनुसार 30 जून से आषाढ़ मास का शुभारंभ हो चुका है, जो 29 जुलाई तक रहेगा। आयुर्वेद में आषाढ़ को ऋतु परिवर्तन का संधिकाल माना गया है। इस दौरान मौसम में तेजी से बदलाव होने के कारण पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है और जलजनित तथा संक्रमणजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में आयुर्वेदाचार्यों ने खान-पान और दिनचर्या में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।
छत्तीसगढ़ के ख्यातिलब्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने बताया कि भारतीय संस्कृति में ऋतुचर्या का विशेष महत्व है। यदि व्यक्ति ऋतु के अनुसार भोजन और दिनचर्या अपनाए तो बदलते मौसम में होने वाली अधिकांश बीमारियों से बचा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आषाढ़ मास में उबालकर या स्वच्छ पानी पीना चाहिए तथा हल्का, ताजा और सुपाच्य भोजन करना चाहिए। मसालेदार, तले-भुने और अधिक भोजन से बचना आवश्यक है, क्योंकि इस समय पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर रहती है। भोजन में सौंफ और हींग का प्रयोग लाभकारी माना गया है।
डॉ. शर्मा के अनुसार इस मौसम में जामुन का सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है, जबकि बेल का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन संबंधी परेशानियां और आंतों के संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है। उन्होंने बताया कि स्कंद पुराण में भी आषाढ़ मास के दौरान एकभुक्त व्रत अर्थात एक समय भोजन करने का उल्लेख मिलता है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी माना गया है।
उन्होंने लोगों से नियमित योग, प्राणायाम, व्यायाम और शारीरिक श्रम करने की अपील करते हुए कहा कि दिन में सोने और रात में देर तक जागने की आदत से बचना चाहिए। मौसम में बढ़ती नमी और संक्रमण को देखते हुए स्वच्छता, संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या अपनाना बेहद जरूरी है।
क्या खाएं
फल: आम, जामुन, तरबूज।
अनाज: जौ, ज्वार, मक्के का भुट्टा।
दालें: मूंग, चना, तुअर, मोंठ, मसूर।
सब्जियां: लौकी, करेला, कद्दू, ककड़ी, तरोई, जिमीकंद, सहजन की फली, चौलाई, हरा धनिया, पुदीना।
मसाले: सौंफ, हींग, जीरा, सूखा धनिया, हल्दी, काली मिर्च, मेथी, दालचीनी और मीठा नीम।
क्या नहीं खाएं
अनाज व दालें: बाजरा, पुराना गेहूं, उड़द, कुलथी।
सब्जियां: बैंगन, गाजर, मूली, फूलगोभी, पत्तागोभी।
फल: बेल और पपीता।
परहेज करें: तले-भुने, अधिक तेल-मसाले वाले, बासी एवं भारी भोजन तथा अत्यधिक भोजन (ओवर ईटिंग) से।
आयुर्वेद के अनुसार ऋतु परिवर्तन के समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और पाचन शक्ति प्रभावित होती है। ऐसे में ऋतुचर्या का पालन, संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल और नियमित व्यायाम अपनाकर वर्षा ऋतु में होने वाली अधिकांश मौसमी बीमारियों से बचा जा सकता है।











